बुधवार, 19 अगस्त 2015

कलाम जइसे बन जाबे ग



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जनम ल पाके जग म मनखे
कोन रद्दा ल धरबे ग
कोन जानही का तय बनबे
का करबे का जपबे ग
अपन करइया सबोझन होथे
दूसर ल मलहम लगाबे ग
देशसेवा म तन-मन बिछोके
कलाम जइसे बन जाबे ग
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ए जीनगी जुग हे ठग्गू जग्गू
चकाचक म झिन भुलाबे ग
रुपीया पइसा सकेल के तय
कतेक का ले डारबे ग
आनीबानी पहिरके सवांगा
कोन ल कतेक देखाबे ग
छोड़ के तय देखावा ल संगी
कलाम जइसे बन जाबे ग
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बन जाबे कभु तय नेता
कुरसी झन जमाबे ग
माटी कोईला बेच के तैहा
संदूक झिन भरलेबे ग
गरीब ल लड़हार के कभु
अचरा ल झन झपटबे ग
मनखे मनखे के दरद हरैया
कलाम जइसे बन जाबे ग



मिलन मलरिहा

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

*********रूख लगावा*जंगल बचावा********

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उठ जा किसान जाग जा कब तोर निंदवा भागही
आसो पानी टिपीक टापक हे थरहा कब जागही

खेती म जूवा खेले छत्तीसगढीहा चिनता बड़ भारी
बूता करइया नइ हे कोनो ठलहा बइठे अरई तुतारी
रूख कटाई म मउसम रिसागे ओला अब मनावा
आवा सब्बो जूरमील घरोघर एकेक रुख लगावा
ओखर छांव तरी दूखके बेरा झटकुन बुलक जाही
बला बला के ओही ह संगी करीया बादर ल लाही
उठ जा किसान .............................................

मसीनवा जूग हे संगी उदयोग धनधा होगे अपार
जंगलझाड़ी झरगे दिनदिन ढुड़गा होवत सनसार
झन काटव रूखराई ल जीवजनतु के सूनव गोहार
अपन बनौकी बर बीगाड़व झन दूसर के घरदुवार
चारदिनीया चंदेनी खातिर हरियर रुख ल झनमार
चिराई जीव ल तरसाके जीनगी सुख कइसे आही 
उठ जा किसान .............................................

फुरहुर फुरहुर पवन नदागे जाने कहा ले धुर्रा आगे
नदिया नरवा कुआँ तलाव तरिया ले पानी अटागे
अभी असाढ सावन भादो म कउख्खन गरमी आगे
जंगल के मितान पानी हे संगी ओला फेर सजावा
आवा सब्बो जूरमील घरोघर एकेक रुख लगावा
ओही ह संगी,हमर जीनगी खार मानसुन ल बलाही
उठ जा किसान .............................................
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मिलन मलरिहा

रविवार, 2 अगस्त 2015

पुसतक ले पियार कर


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उठ जाग भीनसारे
पुसतक खोल तय प्यारे
कागज कलम ले पियार कर
गियान ल खोज टमर धर
माथा म लेके बीचारकर
बुद्धी दवाई नोहे संगी
जेला कोइ बरदान देही
बने चेत जगा धियानकर
मटरगस्ती ल छोडके बाबू
पुसतक ले पियार कर
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बने पढबे बने जघा ल पाबे
बेरा ह निकलत हे संगी
पानी बोहावत हे सकेलडर
सनसार म मिलही उचकइया
अपनरद्दा म कलेचुप आएकर
चकाचउन्ध हे पारा मोहल्ला
फोनवा ल झीनधर
सिटबाजी ल छोड तय
पुसतक ले पियार कर
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हमर हिजगा झीनकर
हमन रोज वाट्सेप चलाबो
फेसबुक ल धरे रहिबो
हमर समय निकल गे
अपनखुद बर रद्दा गढ़
भाईजान बाहुबली ल छोड़
टीबी सिनेमा ल बाद म 
धरबे आउ रपोटबे
तोर बेलेनटोइन अभी पाछु कर
एतिओती ल छोड़के
पुसतक ले पियार कर
............................


मिलन मलरिहा

सोमवार, 27 जुलाई 2015

**कहाँ चले भईया**

**कहाँ चले भईया**


बइला भइसा चरइया खुमरी पागा के बंधइया
ए जवइया तय गांव छोड़के कहा चले भईया

दुःख पीरा के संगी, अपन गांव के करीयामाटी
एला छोड़ तय नई पावच कोनो महेल अटारी 
अपन गाँव म जीबो मरबो बर छईहा म बइठबो
जुरमीर जम्मो सकलाके किस्सा कहानी सुनबो
तय तरिया के नहइया गुल्ली डंडा के खेलइया
नांगर जोतइया आमा चटनी बसी के खवइया
ए जवइया ...........................................

अगोरा म जम्मो संगी साथी रोज नाव लेही
तोर सुध म गरुवा बछरु के आसू ढर जाही
गाँव  के चिराई चुरगुन तको तोला गोहराही
बहरा खार के माटी रइह रइह तोला बलाही
बरदी के सकलइया बास बसरी के बजइया
तय धोती के पहनइया घीवतेल के चुपरइया
ए जवइया ..............................................

करपा बीड़ा सकलइया अउ डोरी के बनइया
गाड़ा भइसा फंदइया तय बेलन के मिसइया
ठुठी बीड़ी के पियइया डोकरा संग बइठइया
अपन गाँवके भाखा पीपरचौरा कहुं नइ पावच
हासी ठीठोली करके डोकरीमन ल चुलकावच
बीही बर बमरी छाव जीनगी के डोंगा पेलइया
ए जवइया ..............................................

जिहा जाबे लहुट आइबे अपन गांव हे बढ़िया 
चारदिनिया सुहाही तोला सहर चकोरी भुइया 
गरमी धुर्रा नाली मच्छर रहिथे घोलहा पताल
सुग्घर चमके दिकथे उहा जम्मो के घर दुवार 
बाहीर ले सरग तरी ले नरक बीमारी हे अपार 
तय मेड़ के चलइया आउ खेत-खार के रेंगइया 
ए जवइया ................................................
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मिलन मलरिहा
छत्तीसगढीहा

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

****परमाण पत्र*****

परमाण पत्र पाके कइसे तै करबे
जाने सीखे रहिबे तभेच आघु बड़बे
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        इसकुल कालेज कमाई के हे अड्डा
        बेचावत हे डिगरी फेर का के चिनता
        बीए एमबीए ह ठट्ठा मजाक बनगे
        कमपुटर के घलो पानठेला म बिकथे
        बारवीं निकलना हावे ओपन म भरदे
        माथा म चटकाके गली गली गिन्दरबे......
परमाण पत्र पाके कइसे तै करबे
जाने सीखे रहिबे तभेच आघु बड़बे
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        नकली ह आघु बड़गे असली पिछवागे
        बुद्धी के देवइया आज पइसा म मतागे
        राहेरदार माड़गे संगी अकरीदार बेचागे
        गली गली ठलहा खड़े, बेरोजगारी आगे
        नौकरी खोजत खोजत जिनगी ह पहागे
        अउ कतेका डिगरी धरबे  तय सकेलबे....
परमाण पत्र पाके कइसे तै करबे
जाने सीखे रहिबे तभेच आघु बड़बे
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         रापा गैती कुदारी  हसीया के चलइया
         कबले  इनजीनीअर कागज पाए भइया
         एक महीना म  पाॅजीडीसीए  घलो पाए
         पानठेला म बइठके सबला पान खवाए
         दूसरेच महिना म बीएड बीना कहु जाए
         एतिओति बाराकोति करके का करडारबे....
परमाण पत्र  पाके  कइसे तै करबे
जाने सीखे रहिबे तभेच आघु बड़बे
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          पड़हाई -लिखाई ल  हासी  मजाक बनाके
          साटकट  के रद्दा म चलके  कतेक  देखाबे
          आमा गोही धरके गियान गुदा कइसे खाबे
          परवर अउ  कुँदरु  के भेद  अंतस म धरके
          छोड़के बेइमानी  बुता काम ल बने सीख ले
          सतरद्दा म चलके एकदिन मनजिल ल पाबे.....
परमाण पत्र  पाके कइसे  तै करबे
जाने सीखे रहिबे तभेच आघु बड़बे
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मिलन मलरिहा
छत्तीसगढीहा
9098889904

बुधवार, 15 जुलाई 2015

*** किसान के दुख ***

आ गे हे अषाढ़ ह संगी 
सावन ह तिरयावत हे 
पानी ल बला बला  के 
बेंगचा ह चिल्लावत हे 

चार दिन के टिपिक टापक 
खेत म नई माड़हत हे 
हमर तो मरना होगे संगी 
धान ह जर जावत हे 
तभो ले पानी काबर आतिच
किसान ल रोवावत हे 
आ गे हे अषाढ़ ………………

किसान के दुख हे भईया
खेत ह सुखावत हे 
धान पान नई होही त
कइसे जीनगी चलाबो ग 
उठ बिहिनीहा सुध ह 
खेतच म चले जावत हे 
आ गे हे अषाढ़ ………………

सपना होगे पानी ह भाई
बादर ह दुरिहावत हे 
नांगर बइला घर बइठके
अकाल ल गोहरावत हे 
अषाढ़ बनगे चइत भईया
डबरा खचवा ल छोड़ 
जम्मो तारिया ह सुखावत हे 
आ गे हे अषाढ़ ………………

लगथे अकाल पड़गे भईया
लागा दिन दिन बाढ़त हे 
बिजहा बर लेहेव बाढ़ी
दुई कोरी कुरो के धान
छूटे बर छुटत हे परान
आजा बदरी मलार खार म 
जीवरा मोर रोवत हे 
किसान के दुख़ देख के 
खेती ले बिसवास उठत हे 
आ गे हे अषाढ़ ………………
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मिलन मलरिहा


मंगलवार, 7 जुलाई 2015

****** बेटी *******


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अपनो से जूदा होकर
नव परिवार सजाती है
वह बेटी ही तो है जहां मे
जगत को चलना सिखाती है
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रुकी तो धरा नर्क है
चली तो यहाँ स्वर्ग है
बच्चे, बुढ़ो का है आधार
सेवा पर टीकी है संसार
सबकी सहती न अकड़ती
दुखो का भार उठाती है
वह बेटी ही तो है जहां में
जगत को चलना सिखाती है
-
वह रुठी तो जग मुरझाई
हंसी अगर सब हरियाई
सब मान उसी की दम पर
बेटो ने आज जो पायी है
जब ठुकराया इन बेटो ने
बुजूर्गो को सम्हालती आयी है
वह बेटी ही तो है जहां में
जगत को चलना सिखाती है
-
बेटो को जड़ मान लिया है
दिन दिन बेटो का चाह किया है
फिर भी अनचाही डालो में
इन बेटो की खेत बागो में
नन्ही कलि खिल जाती है
बिन खाद वह बढ़ आती है
वह बेटी ही तो है जहां में
जगत को चलना सिखाती है
-
मान, सबकी की शान वही
घर घर की पहचान वही
फिर क्यो, तोड़ मरोड़ देते
बागो की सुन्दर फूल वही
नीत न त्यागो बगीया से
सभी फूल सूख जायेगा
लगता वह दिन दूर नही
तीसरा युद्ध पनप आयेगा
-
समेटो बिखरती जा रही है
अमुल्य मूरझाती पुष्पडाल
सूने आंगन को चमकाती है
वह बेटी ही तो है जहां में
जगत को चलना सिखाती है
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मिलन मलरिहा

शनिवार, 27 जून 2015

## चल नांगर बइला जोर ले ##


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चल धरले नांगर संगे बइला जोर ले
बलावत हे तोला बहरा खेत के माटी
अरई तुतारी ल घलो जोर सकेल ले
मेड़ तरी कोचईपान म बइठे बेंगवा
रइह रइह तोला जपत गोहरावत हे ..
रिमझिम रिमझिम  पानी धुन म
आनीबानी सवनहा कीरा मटमटात हे
संगे पिटपिटी सपवा अड़बड़ निकले
डबरा के  चिखला तरी जोखवा बइठे
बइला भाईसा आयेके ओला अगोर हे..
घोंघी गेंगरुवा अउ केकरा के सोर हे
घूमर घूमर बादर गरजे पानी ह बरसे
छाता ल बने बीजहा संग धरजंगोर ले
चल धरले नांगर संगे बइला जोर ले.........
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मिलन मलरिहा
छत्तीसगढ़िहा

*****क्यों कराये हमें आजाद ?*****


आजादी का वह ताम्रपत्र
शहीदो ने जो पाया
घीस गये वसुंधरा में
बस लोहा टीन बन पाया
क्यों किया तुमने यह
क्या खोया क्या पाया ?
यही पूछते है सभी फिसाद
रहने देते गुलाम हमें
क्यों कराये तुम हमें आजाद ?
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कलयुगी ज्ञान देती ललकार
आजादी से बड़े सुचना का अधिकार
कैसे पके है आपके बाल ?
लाठी टेक क्यों लन्दन गए
बीना शस्त्र कैसे किये प्रहार
यही पूछते है सभी फिसाद
रहने देते गुलाम हमें
क्यों कराये तुम हमें आजाद ?
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मिलन मलरिहा

बुधवार, 10 जून 2015

**दाई-ददा **

छोड़ के तै गुमान ल संगी
बन जा पिरीत जोड़इया ग
चारदिनिया हे जिनगी हमर
दाई ददा ल झिन भुलइहा ग
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जाही त नइ पावच ओला
फेर गुन गुन के तै रोबे ग
ओही दाई के मया कोरा ल
कोनो जिनगी कइसे पाबे ग..
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सौ जनम ल कोन ह देखे
पतियाए काकर भाखा ग
इही जिनगी  दुख  पीरा के
करले इहेच हे पुन पाप  ग..
-
ए जिनगी एकबार हे संगी
दाई ददा घलो एकबार हे ग
कइसे छुटबे तै मया के लागा
ए जिनगी ओखर उधार हे ग..
-
छोड़ के तै गुमान ल संगी
बन जा पिरीत जोड़इया ग
चारदिनिया हे जिनगी हमर
दाई ददा ल झिन भुलइहा ग
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.मिलन मलरिहा

गुरुवार, 4 जून 2015

फिर तू एक गॉव बसाएगा

फिर तू एक गॉव बसाएगा
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राहें निकलती है उस ओर
गॉव खेत के अंतिम छोर 
नीत आता सूरज गॉव से
वह  भी तो चला है जाता
शहरो की ओर ही भागता
अब जगह जगह है शहरी
सब जीव हो गए बहरी
थककर तू कुछ न पायेगा
नीव का इट गिर जायेगा
फिर तू एक गॉव बसाएगा
-
वे पंछी गाते गीत वहां की
जिसने सीखा यहाँ चलना
वह भी दिन दूर नहीं
तू रो रो कर पछतायेगा
जिस दिन जलती देह लेकर
तू मातृभूमि की छाव आयेगा
रगड़ रगड़ मिटटी में ये तन
तालाबों में डुबकी लगाएगा
एकदिन चकचौंध नकारकर
फिर तू एक गॉव बसाएगा....
-
बदलते परिवेष नवधरा 
धूप ही धूप से है भरा
तपती जलती वसुन्धरा
हरे-भरे दूब घास मिलेंगे
बागों में बस पुष्प खिलेंगे
नवराहे निर्माण सजाकर
गांव-खेतों से वृक्ष हटाकर
गगनचुम्बी मंजील गढ़कर
स्वमेव अनल दहलाएगा
शाँत मधुबन बरगद छाँव
मथ गुँजता चिखता पुकारेगा
फुल भँवरो की धुनश्रोता
फिर तू एक गॉव बसाएगा....
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-मिलन मलरिहा



शुक्रवार, 29 मई 2015

मोर ददा के बीमा

मुसकिल करदिच जीना
वह रे मोर ददा के बीमा
मरइया मर के चले जाथे
लइका मन बड़ दुःख पाथे
बीमा करइया ल दुःख के
कइसे नई होयव चिनहारी
ओखर मुड़ी भूत सचर गे
पइसा कमीसन के भारी
कतेक काटही चक्क्रर
ए दफ़्तर ले ओ दफ्तर
संसो म जी बेहाल होगे
सुहावत नई हे खाना पीना
मुसकिल करदिच जीना
वह रे मोर ददा के बीमा
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बीमा के पहली तोला सेवा
अउ मेवा घलो ख़वाही
अटको म तय नई माने
तोर परवार ल भुलवारही
आधा पइसा ल पा तो गे
फेर तोला चक्कर लगवाही
लगावत लगावत चक्कर
जिनगी के बेरा अधियाही
चारठन गलती रोज बताही
तोर नाम तोर दाई के नाम
नई जुड़े हावय कहिके एमा
तोर ददा लउहा कइसे मरगे
आखरी किस्ती अउ दस्तखत
ल अब कोन करहि एमा
जघा जघा म जा जा के
निकल गे मोर पसीना
मुसकिल करदिच जीना
वह रे मोर ददा के बीमा
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बुधवार, 13 मई 2015

पढाई ले मन जोड़ ले


एती तेती ल छोड़के पढाई ले मन जोड़ ले 
बेरा निकलत हे गियान ल धर सकेल ले 
अब्बड़ पछताबे संगी सबझन ल देख के 
मोबाईल ल पटक के सीटबाजी ल छोड़ दे 
समय जावत हे दाई ददा के भाखा धर ले 
एती तेती ल छोड़के पढाई ले मन जोड़ ले
बेरा निकलत हे गियान ल धर सकेल ले



M kant

मंगलवार, 5 मई 2015


छत्तीसगढ़ी कविता **गांव के रहैया** के कुछ पंक्ति...
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ए जवइया तय गांव छोड़के कहा चले भईया
दुःख पीरा के संगी, हमर गांव के बहरा माटी
एला छोड़ तय नई पावच कोनो महल अटारी
तय तरिया के नहइया गुल्ली डंडा के खेलइया
नांगर जोतइया आमा चटनी बसी के खवइया
ए जवइया तय गांव छोड़के कहा चले भईया

जिहा जाबे लहुट आइबे अपन गांव हे बढ़िया
चारदिनिया सुहाही तोला शहर चकोरी भुइया
धुर्रा कचरा नाली मच्छर आउ हे सरहा पताल
सुग्घर चमके दिकथे उहा जम्मो में घर दुवार
बाहिर ले सरग तरी ले नरक बीमारी हे अपार
तय मेड़ के चलइया आउ खेत-खार के रेंगइया
ए जवइया तय गांव छोड़के कहा चले भईया