गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

"अंतिम मनुष्य" कहानी

 

अंतिम मनुष्य 

कहानी

लेखक : मिलन मलरिहा

इक्कीसवीं सदी अपने अंतिम पड़ाव पर थी। विज्ञान ने मनुष्य को चाँद तक पहुँचा दिया था। मंगल ग्रह पर बस्तियाँ बस चुकी थीं। समुद्र की अतल गहराइयों में कृत्रिम नगर खड़े हो गए थे। सुपर कम्प्यूटर मनुष्य की कल्पना से भी अधिक तीव्र गति से गणनाएँ कर रहे थे। रोबोट खेतों में काम करते थे, अस्पतालों में ऑपरेशन करते थे और अंतरिक्ष में नए ग्रहों की खोज करते थे।लेकिन इस सारी प्रगति के बीच मनुष्य एक ऐसी भूल कर बैठा था, जिसकी कीमत पूरी पृथ्वी को चुकानी पड़ी। वह भूल थी। प्रकृति के विरुद्ध युद्ध। कारखानों से निकलता जहरीला धुआँ, नदियों में बहता रासायनिक कचरा, जंगलों का अंधाधुंध विनाश और वातावरण में बढ़ती जहरीली गैसों ने पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को नष्ट कर दिया था। ओजोन परत इतनी क्षतिग्रस्त हो चुकी थी कि सूर्य की घातक पराबैंगनी किरणों से बचना कठिन हो गया था। जलवायु परिवर्तन ने मौसमों का चरित्र बदल दिया था। कहीं समुद्र शहरों को निगल रहे थे, तो कहीं धरती की छाती फट रही थी। कहीं भीषण सूखा था, तो कहीं वर्षों तक वर्षा रुकने का नाम नहीं लेती थी। धीरे-धीरे अनेक महाद्वीपों से मनुष्य की सभ्यता मिटने लगी। अफ्रीका के विशाल भूभाग में कुछ बिखरे हुए समुदाय ही जीवित रह सके थे। वे प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर आदिम जीवन जी रहे थे। उनके पास न आधुनिक अस्पताल थे, न दवाइयों के कारखाने और न ही भोजन बनाने वाली स्वचालित मशीनें। उनके पास केवल जंगल, नदियाँ और जीवित रहने की अदम्य इच्छा थी। उधर, कुछ धनकुबेर पूँजीपतियों ने अपनी संपत्ति और तकनीक के बल पर चाँद तथा मंगल ग्रह पर सुरक्षित ठिकाने बना लिए थे। वैज्ञानिकों के एक समूह ने समुद्र की गहराइयों में कृत्रिम आवास तैयार कर लिए थे।लेकिन पृथ्वी पर रहने वाले करोड़ों लोगों को बचाने के लिए उनके पास कोई योजना नहीं थी। विज्ञान ने कुछ लोगों को बचा लिया था, पर मनुष्यता को नहीं। भारत की स्थिति भी अलग नहीं थी।

           कभी सभ्यता, संस्कृति, धर्म, दर्शन और विविध परंपराओं के लिए प्रसिद्ध इस देश में अब अधिकांश नगर खंडहर बन चुके थे। मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों और गुरुद्वारों के अवशेषों पर जंगल उग आए थे। मनुष्य की बनाई सीमाएँ मिट चुकी थीं। धर्म और संप्रदाय के नाम पर लड़ने वाले लोग इतिहास की कहानियों में सिमट गए थे।

            अब प्रश्न यह नहीं था कि कौन किस धर्म को मानता है। प्रश्न केवल इतना था कि अगली सुबह तक कौन जीवित रह पाएगा। भारत के एक सुदूर वन क्षेत्र में इंद्रावती नदी अब भी बह रही थी। उसके दोनों ओर फैले घने जंगलों के बीच दस झोपड़ियों का एक छोटा-सा समूह बचा हुआ था। वहाँ कुल कितने लोग थे, इसका कोई निश्चित हिसाब नहीं था। कुछ बच्चे थे, कुछ बूढ़े और कुछ ऐसे युवक-युवतियाँ, जिन्होंने इस उजड़ी हुई दुनिया में ही जन्म लिया था। वे मछलियाँ पकड़ते, जंगल से फल-कंद एकत्र करते और नदी के किनारे सीमित भूमि पर छायादार खेती करते थे। प्रकृति ने उन्हें कठोर बना दिया था। उनके पास बिजली का स्थायी प्रबंध नहीं था, लेकिन एक ऐसी मशीन थी, जिसने उन्हें जीवित रहने में बहुत सहायता दी थी।उस मशीन का निर्माता था - विनोवा। विनोवा  उजड़ी हुई दुनिया का अंतिम वैज्ञानिक था। विनोवा केवल एक वैज्ञानिक नहीं था। वह उस छोटे समुदाय का मार्गदर्शक, चिकित्सक, शिक्षक और संकटमोचक भी था। उसने अपने पुराने वैज्ञानिक उपकरणों को जोड़कर एक ऐसा यंत्र बनाया था, जो मौसम के परिवर्तन, मिट्टी की गुणवत्ता, जल की शुद्धता और जंगल में होने वाले असामान्य बदलावों की जानकारी दे सकता था। उसकी झोपड़ी के एक कोने में सौर ऊर्जा से चलने वाला एक छोटा सुपर कम्प्यूटर रखा था। उसका संपर्क पृथ्वी के पुराने वैज्ञानिक नेटवर्क के कुछ जीवित केंद्रों से था। कभी-कभी उसे अंतरिक्ष से आने वाले संकेत भी प्राप्त होते थे।विनोवा के लिए तकनीक का अर्थ सत्ता प्राप्त करना नहीं था। वह तकनीक को जीवन बचाने का साधन मानता था।वह अक्सर अपने समुदाय के बच्चों से कहता था-"हमारे पूर्वजों ने मशीनें बनाईं, लेकिन वे यह भूल गए कि मशीनों को चलाने के लिए जिस पृथ्वी की जरूरत है, उसे बचाना भी आवश्यक है। यदि जंगल नहीं बचेंगे, तो मशीनें किसके लिए काम करेंगी? यदि मनुष्य ही नहीं बचेगा, तो विज्ञान की उपलब्धियों का अर्थ क्या रह जाएगा?"  बच्चे उसकी बातें ध्यान से सुनते थे। वे यह नहीं जानते थे कि कभी इसी पृथ्वी पर अरबों मनुष्य रहते थे। उनके लिए दस झोपड़ियों का यह संसार ही पूरी दुनिया था। विनोवा ने उन्हें मछली पकड़ना, खेती करना, औषधीय पौधों को पहचानना और जंगल के संकेतों को समझना सिखाया था। उसका एक नियम था-"मशीन पर भरोसा करो, लेकिन अपना विवेक कभी मशीन के हवाले मत करो।" वह नहीं जानता था कि एक दिन यही नियम उसके पूरे समुदाय को एक ऐसे खतरे से बचाएगा, जिसकी कल्पना करना भी कठिन था। 

पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर मंगल ग्रह पर भी मनुष्य का जीवन आसान नहीं था।

वहाॅं रहने वाले लोगों ने कृत्रिम वातावरण वाले विशाल आवास बना लिए थे। ऑक्सीजन संयंत्रों, जल पुनर्चक्रण प्रणालियों और स्वचालित कृषि इकाइयों की सहायता से वे जीवित थे। फिर भी मंगल उनका घर नहीं बन पाया था। वहाँ की कृत्रिम हवा में पृथ्वी के जंगलों की सुगंध नहीं थी। वहाँ की मिट्टी में इंद्रावती नदी के किनारे उगने वाली फसलों जैसी सहजता नहीं थी। हर साँस तकनीक पर निर्भर थी और हर भोजन किसी मशीन की गणना का परिणाम था। मंगल पर रहने वाले अनेक परिवार दो सौ वर्षों से अधिक समय से वहाँ जीवन व्यतीत कर रहे थे। उनके पास अपने पूर्वजों के अभिलेख, पृथ्वी के पुराने चित्र, वीडियो और वैज्ञानिक दस्तावेज सुरक्षित थे। उनमें से एक था मौलवा।

              मौलवा एक अत्यंत प्रतिभाशाली वैज्ञानिक का बेटा था। उसके पिता ने मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और कृत्रिम शरीरों पर लंबे समय तक शोध किया था। उसी शोध को आगे बढ़ाते हुए मौलवा ने एक ऐसी तकनीक विकसित की थी, जिसके माध्यम से मनुष्य के मस्तिष्क की संरक्षित सूचना और तंत्रिका-संबंधी प्रतिरूप को दूसरे उपयुक्त जैविक शरीर में स्थानांतरित करने का प्रयास किया जा सकता था। इस तकनीक की सहायता से वह अपने जीवन को सामान्य मनुष्यों की तुलना में असाधारण रूप से लंबा कर चुका था। वह लगभग डेढ़ सौ वर्षों से जीवित था। उसके लिए समय का अर्थ बदल चुका था। उसके समकालीन लोग बूढ़े होकर मर गए थे, जबकि वह अपने वैज्ञानिक प्रयोगों के सहारे जीवित बना हुआ था।  लेकिन उसकी अमरता की एक सीमा थी। उसकी तकनीक को समय-समय पर एक नए जैविक शरीर की आवश्यकता पड़ती थी। मंगल पर कृत्रिम शरीर बनाए जा सकते थे, लेकिन उसकी विशेष प्रक्रिया के लिए जिस प्रकार के जैविक संसाधन और अनुकूल परिस्थितियाँ चाहिए थीं, वे उपलब्ध नहीं थे। अब उसे एक नए शरीर की आवश्यकता थी और उसके पास समय बहुत कम बचा था।  पृथ्वी पर लौटना , मौलवा का एक और सपना था। उसने अपने पूर्वजों के अभिलेखों में नीले समुद्र, हरे जंगल, पहाड़ों, झरनों और खुले आकाश के नीचे बसे गाँवों को देखा था। उसे विश्वास था कि एक दिन पृथ्वी फिर से रहने योग्य हो जाएगी।मंगल के सुपर कम्प्यूटरों से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार पृथ्वी के कुछ हिस्सों में प्रदूषण का स्तर धीरे-धीरे घट रहा था। कुछ जंगलों में वनस्पतियाँ फिर से उग रही थीं और कुछ नदियों में जीवन के संकेत दिखाई देने लगे थे। मौलवा को यह भी पता चला था कि भारत के एक वन क्षेत्र में मनुष्यों का एक छोटा समुदाय अब तक जीवित है। उसके मन में एक योजना ने जन्म लिया। वह पृथ्वी पर जाएगा। वहाँ के लोगों के साथ रहेगा। उनकी सहायता करेगा और अपने पूर्वजों के उस सपने को पूरा करेगा, जिसके अनुसार मनुष्य एक दिन फिर से अपनी जन्मभूमि पर लौटेगा। लेकिन इस सुंदर सपने के पीछे एक भयानक रहस्य छिपा था। मौलवा पृथ्वी पर लौटना चाहता था, मगर उसे वहाँ के मनुष्यों से प्रेम नहीं था। उसे आवश्यकता थी—एक नए शरीर 

मौलवा ने अपने अंतरिक्ष यान को पृथ्वी की यात्रा के लिए तैयार किया। उसने अपनी चेतना और मस्तिष्क से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाओं की एक प्रतिलिपि मंगल के सुपर कम्प्यूटर में सुरक्षित कर दी। यदि पृथ्वी पर उसका प्रयोग असफल हो जाता, तो कम से कम उसके शोध और व्यक्तित्व से जुड़ी जानकारी नष्ट नहीं होती। मंगल के वैज्ञानिकों ने उसे चेतावनी दी।"पृथ्वी की परिस्थितियाँ अब भी अनिश्चित हैं। वहाँ का वातावरण, जल और जैविक तंत्र तुम्हारे लिए जोखिमपूर्ण हो सकते हैं। तुम्हें वहाँ जाने से पहले सभी संभावित खतरों पर विचार करना चाहिए।"  मौलवा मुस्कराया। "मैंने डेढ़ सौ वर्षों तक मृत्यु को अपने सामने खड़ा देखा है। अब मुझे किसी चेतावनी से भय नहीं लगता।" उसने अंतरिक्ष यान का द्वार बंद किया। कुछ ही समय बाद यान मंगल के कृत्रिम नगरों को पीछे छोड़ता हुआ अंतरिक्ष में आगे बढ़ने लगा।

सात दिनों की यात्रा के बाद उसे पृथ्वी दिखाई दी। नीले ग्रह का वह रूप अब पहले जैसा नहीं था। कहीं धूल के विशाल बादल थे, कहीं उजड़ी हुई भूमि और कहीं अनियंत्रित जंगलों का विस्तार। फिर भी मौलवा की आँखों में चमक आ गई। "पृथ्वी! मैं लौट आया हूँ।"

उसने अपना यान भारत के एक निर्जन वन क्षेत्र में उतार दिया।

उसका स्थान विनोवा के समुदाय से लगभग दो किलोमीटर दूर था।

यान से बाहर निकलते ही उसने गहरी साँस ली। पृथ्वी की हवा उसके मंगल स्थित आवास की हवा से अलग थी। उसे मिट्टी की गंध महसूस हुई।

वह कुछ क्षणों के लिए भावुक हो गया।

फिर उसने अपने यंत्र सक्रिय किए।

उसे नहीं मालूम था कि पृथ्वी पर उतरने के कुछ ही क्षणों के भीतर उसकी उपस्थिति का पता चल चुका था।

एक मसीन ने दूसरे मशीन के खतरे को पहचान लिया था।

विनोवा अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा मिट्टी की नमी और अगले सप्ताह के मौसम का अनुमान लगा रहा था। अचानक उसके सामने रखे उपकरण पर लाल संकेत चमकने लगा।

उसने स्क्रीन की ओर देखा।

"अज्ञात अंतरिक्ष यान पृथ्वी पर उतरा है। संभावित स्थान : इंद्रावती वन क्षेत्र। अनुमानित दूरी : 2.1 किलोमीटर।"

विनोवा तुरंत सतर्क हो गया।

उसने अपने सुपर कम्प्यूटर से संपर्क स्थापित किया और आने वाले संकेतों का विश्लेषण करने का निर्देश दिया।

कुछ समय बाद स्क्रीन पर एक संदेश दिखाई दिया।

"अंतरिक्ष यान से प्राप्त पहचान संकेत मंगल ग्रह की मानव बस्ती से संबंधित हैं। यात्री का नाम : मौलवा। उद्देश्य की पुष्टि लंबित।"

विनोवा के माथे पर चिंता की रेखाएँ उभर आईं।

मंगल से कोई मनुष्य पृथ्वी पर आया था!

लेकिन क्यों?

क्या वह सहायता माँगने आया था? क्या वह पृथ्वी पर फिर से सभ्यता बसाना चाहता था? या उसके आने का कोई दूसरा उद्देश्य था?

विनोवा ने अपने उपकरण को निर्देश दिया कि वह आने वाले यात्री के संचार संकेतों, वैज्ञानिक अभिलेखों और उपलब्ध सूचनाओं का विश्लेषण करे।

लगभग चौबीस घंटे बाद कम्प्यूटर ने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की।

रिपोर्ट पढ़ते ही विनोवा की आँखें गंभीर हो गईं।

मौलवा की तकनीक, उसकी असाधारण आयु और मस्तिष्क स्थानांतरण से जुड़े प्रयोगों का विवरण सामने था। उसकी पृथ्वी यात्रा का उद्देश्य केवल नया घर बनाना नहीं था। उसे अपने जीवन को आगे बढ़ाने के लिए एक नए जैविक शरीर की आवश्यकता थी।

विनोवा कुछ देर तक मौन बैठा रहा।

फिर उसने धीरे से कहा—

"मनुष्य ने पृथ्वी को नष्ट कर दिया, फिर भी उसका स्वार्थ समाप्त नहीं हुआ। लगता है, वह अपने साथ अपना विनाशकारी स्वभाव भी दूसरे ग्रह पर ले गया है।"

उसने अपने परिवार को सतर्क रहने का निर्देश दिया।

लेकिन उसने यह निर्णय भी लिया कि मौलवा के सामने वह अपनी वैज्ञानिक क्षमता का खुलासा नहीं करेगा।

वह जानना चाहता था कि मंगल से आया यह व्यक्ति वास्तव में क्या चाहता है।

उस दिन दो वैज्ञानिकों की पहली मुलाकात थी।

अगले दिन दोपहर को मौलवा विनोवा की झोपड़ी के सामने पहुँचा।

उसका शरीर एक विशेष सुरक्षा आवरण से ढका हुआ था। उसके कंधे पर एक छोटा उपकरण लगा था, जो आसपास के वातावरण का विश्लेषण कर रहा था।

विनोवा बाहर आया।

मौलवा ने अपने अनुवादक यंत्र को सक्रिय किया।

"क्या तुम इस समुदाय के मुखिया हो?"

विनोवा ने सहजता से उत्तर दिया, "मुखिया तो कोई नहीं है। हम सब मिलकर रहते हैं। मैं बस लोगों की सहायता करता हूँ।"

मौलवा ने आसपास की झोपड़ियों को देखा।

"तुम लोग यहाँ इतने लंबे समय से कैसे जीवित हो? न आधुनिक अस्पताल हैं, न भोजन बनाने वाली मशीनें, न बिजली का कोई बड़ा संयंत्र।"

विनोवा मुस्कराया।

"हमारे पास नदी है, जंगल है, थोड़ी-सी खेती है और एक-दूसरे का साथ है। अभी तक इन्हीं से काम चल रहा है।"

मौलवा के चेहरे पर आश्चर्य दिखाई दिया।

उसने कहा, "मैं मंगल ग्रह से आया हूँ। वहाँ मनुष्य ने आधुनिक तकनीक के सहारे जीवन को बहुत आगे बढ़ा लिया है। लेकिन मैं पृथ्वी पर रहना चाहता हूँ। मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ। मेरे पास ऐसी मशीनें हैं, जिनसे तुम्हारा जीवन आसान हो सकता है।"

विनोवा ने उसकी बात ध्यान से सुनी।

"हमारे पास जो है, उसमें हम खुश हैं। यदि तुम यहाँ रहना चाहते हो, तो तुम्हारा स्वागत है। लेकिन इस समुदाय में सबको समान अधिकार हैं। यहाँ कोई किसी दूसरे के जीवन पर अधिकार नहीं रखता।"

मौलवा ने सिर हिलाया।

"मुझे भी यही चाहिए। मैं तुम्हारे परिवार के साथ रहकर इस समुदाय का हिस्सा बनना चाहता हूँ।"

विनोवा ने उसे आश्रय दे दिया।

लेकिन मन ही मन वह जानता था कि यह अतिथि केवल आश्रय लेने नहीं आया है।

वह किसी अवसर की तलाश में है।

और शायद वह अवसर किसी निर्दोष की जिंदगी छीन सकता है।

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अगले कुछ दिनों में मौलवा ने समुदाय के लोगों का विश्वास जीतना शुरू कर दिया।

उसने बच्चों को छोटे-छोटे वैज्ञानिक उपकरण दिखाए। उसने पानी को साफ करने की एक नई विधि समझाई और कुछ बीमार लोगों की सहायता भी की।

धीरे-धीरे लोग उसे अपना हितैषी मानने लगे।

विनोवा भी उसके साथ सामान्य व्यवहार करता रहा।

लेकिन रात के समय, जब मौलवा गहरी नींद में होता, विनोवा अपने उपकरणों की सहायता से उसके यंत्रों के संकेतों का अध्ययन करता था।

एक रात उसे मौलवा के व्यक्तिगत कम्प्यूटर में सुरक्षित एक गोपनीय कार्यक्रम का पता चला।

उस कार्यक्रम में मस्तिष्क स्थानांतरण की पूरी प्रक्रिया दर्ज थी।

प्रयोग के लिए एक ऐसे जैविक शरीर की आवश्यकता थी, जिसकी तंत्रिका संरचना उसकी तकनीक के अनुकूल हो। कार्यक्रम में किसी दूसरे मनुष्य की चेतना और जीवन की रक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी।

अर्थात मौलवा अपने मस्तिष्क को दूसरे शरीर में स्थानांतरित करने के लिए उस शरीर के मूल स्वामी को स्थायी रूप से निष्क्रिय कर सकता था।

विनोवा की उँगलियाँ कुछ क्षणों के लिए ठहर गईं।

वह समझ चुका था कि मौलवा किसकी तलाश में है।

उसके परिवार में उसका बड़ा बेटा शारीरिक रूप से स्वस्थ, युवा और मौलवा की तकनीकी जाँच के अनुसार उपयुक्त था।

विनोवा ने मौलवा के कार्यक्रम की एक सुरक्षित प्रतिलिपि तैयार की। फिर उसने उस प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले कुछ महत्वपूर्ण निर्देशों की जाँच की।

वह जानता था कि मौलवा की मशीनें अत्यंत उन्नत थीं। कोई भी गलत कदम उसके परिवार के लिए घातक हो सकता था।

उसने सावधानी से कार्यक्रम के कुछ नियंत्रणों को निष्क्रिय कर दिया और सुरक्षा संकेतों को अपने पास सुरक्षित रखा।

अब उसके पास एक ही विकल्प था—सही समय पर मौलवा को रोकना।

कुछ दिन बाद की बात है।

विनोवा अपने खेत में काम कर रहा था। इंद्रावती नदी के किनारे हल्की हवा चल रही थी। उसका बड़ा बेटा झोपड़ी के पास रखे उपकरणों की सफाई कर रहा था।

मौलवा काफी समय से उस अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था।

उसने विनोवा के बेटे को एक विशेष उपकरण दिखाने के बहाने अपने पास बुलाया।

"इस मशीन से मैं तुम्हारे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली का परीक्षण कर सकता हूँ। इससे तुम्हें कोई नुकसान नहीं होगा," उसने कहा।

युवक ने उत्सुकता से उपकरण की ओर देखा।

उसे क्या मालूम था कि सामने खड़ा व्यक्ति उसके जीवन पर अधिकार करने की योजना बना चुका है।

मौलवा ने एक छोटा-सा यंत्र सक्रिय किया।

कुछ ही क्षणों में युवक बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा।

मौलवा ने उसे अपने अस्थायी प्रयोग कक्ष में खींच लिया। उसने अपने सुपर कम्प्यूटर से संपर्क स्थापित किया और मस्तिष्क स्थानांतरण की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया।

स्क्रीन पर कई संकेत उभरने लगे।

"जैविक शरीर की जाँच प्रारंभ।"

"तंत्रिका संरचना का मिलान जारी।"

"स्थानांतरण प्रक्रिया के लिए तैयारी पूर्ण।"

मौलवा की आँखों में उत्साह चमकने लगा।

डेढ़ सौ वर्षों की उसकी यात्रा अब एक नए पड़ाव पर पहुँचने वाली थी।

वह अपने मस्तिष्क की संरक्षित सूचना को नए शरीर में स्थानांतरित कर फिर से युवा हो सकता था। पृथ्वी पर जीवन व्यतीत कर सकता था। अपने पूर्वजों के सपने को साकार कर सकता था।

लेकिन उसने एक बात पर ध्यान नहीं दिया।

उसके कम्प्यूटर पर एक सुरक्षा संकेत लगातार चमक रहा था।

"प्रक्रिया के नियंत्रण में बाहरी हस्तक्षेप की संभावना।"

मौलवा ने उसे अनदेखा कर दिया।

उसे विश्वास था कि पृथ्वी पर कोई उसकी तकनीक को समझने की क्षमता नहीं रखता।

तभी उसके उपकरण से एक तीखी ध्वनि निकली।

विनोवा के पास संदेश पहुँच चुका था।

वह खेत से उठा और तेजी से अपनी झोपड़ी की ओर बढ़ा।

उसके हाथ में वही छोटा नियंत्रक था, जो उसके सुपर कम्प्यूटर से जुड़ा हुआ था।

जब विनोवा प्रयोग कक्ष में पहुँचा, तब मौलवा अपने बेटे के सिर पर लगे उपकरणों के माध्यम से स्थानांतरण प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा था।

विनोवा दरवाजे पर रुक गया।

उसने कुछ क्षणों तक सब कुछ देखा, फिर आश्चर्यचकित होने का अभिनय करते हुए पूछा—

"यह क्या कर रहे हो? मेरा बेटा बेहोश क्यों पड़ा है?"

मौलवा ने उसकी ओर देखा।

"तुम समझ नहीं पाओगे। यह एक अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक प्रक्रिया है। मुझे अपना मस्तिष्क इस शरीर में स्थानांतरित करना है। इससे मैं फिर से लंबे समय तक जीवित रह सकूँगा।"

विनोवा ने भयभीत होने का अभिनय किया।

"लेकिन यह तो मेरा बेटा है!"

मौलवा हँस पड़ा।

"तुम्हारी भावनाएँ तुम्हें कमजोर बनाती हैं। विज्ञान में भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं होता। यह शरीर मेरे लिए आवश्यक है।"

विनोवा ने धीमे स्वर में कहा, "तो क्या तुम्हें जीवित रहने के लिए किसी दूसरे को मारना पड़ेगा?"

मौलवा का चेहरा कठोर हो गया।

"यदि मैं जीवित नहीं रहूँगा, तो मेरे डेढ़ सौ वर्षों के शोध का क्या होगा? मेरी बुद्धि, मेरी खोजें और मेरा ज्ञान नष्ट हो जाएँगे। मैं साधारण मनुष्य नहीं हूँ।"

विनोवा ने उसकी आँखों में देखा।

"हर मनुष्य अपने जीवन को महत्वपूर्ण समझता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसे दूसरे का जीवन छीनने का अधिकार मिल जाता है।"

मौलवा ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया।

उसने अपने सुपर कम्प्यूटर को स्थानांतरण प्रक्रिया आगे बढ़ाने का आदेश दिया।

उसी क्षण विनोवा ने अपना नियंत्रक सक्रिय कर दिया।

उसकी मशीन ने मौलवा के कम्प्यूटर से संपर्क स्थापित कर लिया।

स्क्रीन पर एक नया संदेश उभरा—

"अनधिकृत मस्तिष्क स्थानांतरण का प्रयास पहचाना गया। सुरक्षा नियंत्रण सक्रिय।"

मौलवा चौंक उठा।

"यह कैसे संभव है?"

उसने अपने कम्प्यूटर को प्रक्रिया जारी रखने का आदेश दिया, लेकिन नियंत्रण प्रणाली ने उसके आदेश स्वीकार करने बंद कर दिए।

विनोवा ने अपने उपकरण पर एक दूसरा संकेत दबाया।

"जैविक शरीर की सुरक्षा प्राथमिकता पर बहाल।"

मौलवा ने घबराकर अपने यंत्रों को फिर से सक्रिय करने की कोशिश की।

लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

विनोवा ने कई रात पहले ही मौलवा के कार्यक्रम में मौजूद कमजोरियों का अध्ययन कर लिया था। उसने स्थानांतरण प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले महत्वपूर्ण निर्देशों को निष्क्रिय कर दिया था और सुरक्षा नियंत्रण अपने पास सुरक्षित कर लिए थे।

मौलवा को पहली बार एहसास हुआ कि जिस व्यक्ति को वह एक साधारण वनवासी समझ रहा था, वह वास्तव में उससे कम बुद्धिमान नहीं था।

"तुम कौन हो?" मौलवा ने काँपते स्वर में पूछा।

विनोवा ने उत्तर दिया—

"मैं वही मनुष्य हूँ, जो विज्ञान को जीवन बचाने के लिए उपयोग करना जानता है।"

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मौलवा ने अंतिम प्रयास किया।

उसने अपने मस्तिष्क की सुरक्षित प्रतिलिपि को सक्रिय करने के लिए मंगल ग्रह के सुपर कम्प्यूटर से संपर्क साधना चाहा।

लेकिन पृथ्वी पर उतरने के बाद उसने अपने अधिकांश संचार उपकरणों को स्थानीय प्रणाली से जोड़ रखा था। अब विनोवा की मशीन ने उस संपर्क को भी रोक दिया।

मौलवा का शरीर काँपने लगा।

उसके जीवन को लंबा बनाए रखने वाली तकनीक अब उसके नियंत्रण में नहीं थी। मस्तिष्क स्थानांतरण की प्रक्रिया बीच में रुक चुकी थी और उसके तंत्रिका तंत्र को गंभीर क्षति पहुँच चुकी थी।

कुछ ही समय में उसका शरीर पूर्णतः पक्षाघातग्रस्त हो गया।

वह सब कुछ समझ रहा था, लेकिन अपने हाथ-पैर हिलाने में असमर्थ था।

उसकी आँखों में भय था।

जिस अमरता पर उसे गर्व था, वही अब उसके लिए एक बंद कारागार बन चुकी थी।

विनोवा ने अपने बेटे को उपकरणों से मुक्त किया। कुछ समय बाद युवक को होश आ गया। वह कमजोर था, लेकिन सुरक्षित था।

मौलवा जमीन पर पड़ा हुआ था।

उसने विनोवा की ओर देखा। उसकी आँखों में प्रश्न था—क्या उसके साथ भी वही होगा, जो वह दूसरे के साथ करने जा रहा था?

विनोवा ने उसके पास बैठकर कहा—

"तुम्हारे साथ वैसा नहीं होगा, जैसा तुम मेरे बेटे के साथ करने जा रहे थे। हम तुम्हें जीवित रखने का प्रयास करेंगे। लेकिन तुम्हारी तकनीक से किसी दूसरे का जीवन छीनने की अनुमति तुम्हें नहीं दी जा सकती।"

मौलवा की आँखों से आँसू बह निकले।

उसने अपने जीवन में अनेक वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हासिल की थीं। उसने मृत्यु को चुनौती दी थी। उसने अपने मस्तिष्क की प्रतिलिपि सुरक्षित की थी। उसने मंगल ग्रह से पृथ्वी तक की यात्रा की थी।

लेकिन वह एक छोटी-सी बात भूल गया था—

दूसरे के जीवन का सम्मान किए बिना अपना जीवन बचाने का कोई भी प्रयास मनुष्यता की कसौटी पर सफल नहीं हो सकता।

उसकी अमरता का सपना टूट चुका था।

और पृथ्वी पर लौटकर नया जीवन शुरू करने की उसकी योजना भी समाप्त हो गई थी।

उस रात इंद्रावती नदी के किनारे विनोवा बहुत देर तक बैठा रहा।

आकाश में तारे चमक रहे थे। कभी इन्हीं तारों को देखकर मनुष्य ने अंतरिक्ष में जाने के सपने देखे थे। उसने चाँद और मंगल तक पहुँचने के लिए विशाल यान बनाए थे। उसने प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए अनगिनत प्रयोग किए थे।

लेकिन अपनी ही पृथ्वी को बचाने में वह असफल हो गया था।

विनोवा ने नदी की ओर देखा।

उसे अपने पूर्वजों की कहानियाँ याद आईं—उन सभ्यताओं की, जो कभी बहुत शक्तिशाली थीं, लेकिन अपने अहंकार और स्वार्थ के कारण नष्ट हो गईं।

उसने अपने बेटे को पास बुलाया।

"आज हमने केवल तुम्हारा जीवन नहीं बचाया है। हमने एक विचार को भी बचाया है।"

बेटे ने पूछा, "कौन-सा विचार, पिता?"

विनोवा ने उत्तर दिया—

"यह कि मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि अमर होना नहीं है। सबसे बड़ी उपलब्धि है—मनुष्य बने रहना।"

अगली सुबह समुदाय के लोग एकत्र हुए। उन्होंने मौलवा को उपचार के लिए सुरक्षित स्थान पर रखा। विनोवा ने निर्णय लिया कि उसकी वैज्ञानिक जानकारी का उपयोग केवल उन्हीं परिस्थितियों में किया जाएगा, जहाँ उससे किसी का जीवन बचाया जा सके।

मंगल ग्रह से आने वाले संकेतों की निगरानी भी जारी रखी गई।

अब विनोवा जानता था कि पृथ्वी पर लौटने का सपना देखने वाले लोग फिर आ सकते हैं। उनमें कुछ सहायता करने वाले होंगे, कुछ अपने स्वार्थ के लिए आएँगे।

लेकिन वह तैयार था।

उसने अपने सुपर कम्प्यूटर में एक नया संदेश दर्ज किया—

"पृथ्वी पर मनुष्य का भविष्य उसकी तकनीक से नहीं, उसके आचरण से निर्धारित होगा।"

फिर उसने अपने छोटे-से समुदाय की ओर देखा।

दस झोपड़ियाँ थीं। कुछ खेत थे। नदी बह रही थी। बच्चे खेल रहे थे। और लोग अपने हाथों से जीवन का निर्माण कर रहे थे।

सभ्यता के नाम पर संसार में जो कुछ बचा था, वह शायद बहुत कम था।

लेकिन वहाँ मनुष्यता अब भी जीवित थी।

दूर आकाश में मंगल ग्रह एक छोटे लाल बिंदु की तरह चमक रहा था।

विनोवा ने उसकी ओर देखा और मन ही मन कहा—

"हे पृथ्वी! तुम्हें नष्ट करने वाला मनुष्य ही था। अब तुम्हें फिर से बसाने की जिम्मेदारी भी उसी की है। लेकिन इस बार उसे विज्ञान के साथ विवेक और प्रगति के साथ प्रकृति का सम्मान करना सीखना होगा।"

इंद्रावती नदी बहती रही।

जंगलों में हवा चलती रही।

और उजड़ी हुई पृथ्वी पर जीवन की एक छोटी-सी आशा फिर से साँस लेने लगी।

✨✨✨✨✨✨✨समाप्त।✨✨✨✨✨✨✨

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✍️मिलन मलरिहा