शनिवार, 15 अगस्त 2026

भारत की उर्जा क्रांति : कोयले से सौर उर्जा तक (((कहानी)))

भारत की उर्जा क्रांति : कोयले से सौर उर्जा तक

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सुबह का समय था। छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में रहने वाला बारह वर्षीय आरव अपने दादाजी के साथ खेत की मेड़ पर बैठा उगते सूरज को निहार रहा था। दूर क्षितिज पर सुनहरी किरणें फैल रही थीं। आरव ने उत्सुकता से पूछा, "दादाजी, क्या सचमुच यह सूरज पूरे देश को रोशनी दे सकता है?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटा, आज का भारत उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। लेकिन यह यात्रा इतनी आसान नहीं थी।"

आरव की जिज्ञासा बढ़ गई। दादाजी ने कहानी शुरू की।

"आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—हर घर तक बिजली पहुँचाना। उस समय उद्योग कम थे, बिजलीघर भी बहुत कम थे। देश के पास कोयले का विशाल भंडार था। इसलिए बड़े-बड़े ताप विद्युत संयंत्र बने। झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ की खदानों से निकलने वाला कोयला देश के बिजलीघरों तक पहुँचने लगा।"

"क्या वही बिजली हमारे घरों तक आती थी?" आरव ने पूछा।

"हाँ," दादाजी बोले, "कोयले ने भारत के विकास की नींव रखी। कारखाने चले, रेलगाड़ियाँ दौड़ीं, शहर जगमगाए और गाँवों तक बिजली पहुँची। लेकिन समय के साथ यह भी समझ में आया कि कोयले के अत्यधिक उपयोग से धुआँ बढ़ता है, पर्यावरण प्रदूषित होता है और धरती का तापमान भी बढ़ने लगता है।"

आरव कुछ सोच में पड़ गया।

दादाजी आगे बोले, "भारत ने हार नहीं मानी। वैज्ञानिकों ने नई राह खोजनी शुरू की। उन्होंने सोचा कि प्रकृति ने हमें सूरज, हवा और पानी जैसी अनमोल शक्तियाँ दी हैं। यदि इन्हें सही ढंग से उपयोग किया जाए तो ऊर्जा भी मिलेगी और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।"

उसी समय सूरज की किरणें खेतों में लगे सौर पंप पर पड़ीं। मोटर चलने लगी और पानी बहने लगा।

"देखो," दादाजी ने कहा, "यह है सौर ऊर्जा की ताकत।"

आरव की आँखें चमक उठीं।

कुछ दिनों बाद विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी आयोजित हुई। आरव ने "भारत की ऊर्जा यात्रा" विषय पर मॉडल बनाया। मॉडल के एक भाग में कोयले से चलने वाला ताप विद्युत संयंत्र था और दूसरे भाग में सौर पैनल, पवन चक्कियाँ तथा जलविद्युत परियोजनाएँ थीं।

प्रदर्शनी में आए मुख्य अतिथि ने आरव से पूछा, "तुम्हारे अनुसार भारत का भविष्य किस ऊर्जा में है?"

आरव ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया, "सर, कोयले ने भारत के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है। लेकिन भविष्य स्वच्छ ऊर्जा का है। हमें कोयले का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाना चाहिए।"

मुख्य अतिथि मुस्कुराए। उन्होंने कहा, "यही सोच नए भारत की पहचान है।"

आरव को प्रथम पुरस्कार मिला।

कुछ वर्षों बाद आरव ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में कार्य करने लगा। उसका पहला प्रोजेक्ट एक ऐसे गाँव में था जहाँ बिजली की समस्या वर्षों से बनी हुई थी।

गाँव के स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और घरों की छतों पर सौर पैनल लगाए गए। रात में पहली बार पूरा गाँव रोशनी से जगमगा उठा। बच्चों के चेहरे पर खुशी थी। महिलाएँ आसानी से घर का काम करने लगीं और किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली मिलने लगी।

उस रात गाँव के बुजुर्गों ने कहा, "पहले बिजली का इंतजार करते थे, अब सूरज हमारी ताकत बन गया है।"

आरव की आँखों में दादाजी की बातें ताज़ा हो गईं। उसे याद आया कि कैसे उन्होंने कहा था—"विकास का अर्थ केवल अधिक बिजली बनाना नहीं, बल्कि ऐसी ऊर्जा चुनना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहे।"

समय बीतता गया। भारत ने दुनिया के सामने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में नई पहचान बनाई। विशाल सौर पार्क बने, रेगिस्तानों में सौर पैनलों की कतारें दिखाई देने लगीं, समुद्र तटों और पहाड़ों पर पवन चक्कियाँ घूमने लगीं। गाँव-गाँव में सौर स्ट्रीट लाइटें, सौर पंप और रूफटॉप सोलर सिस्टम लगने लगे।

फिर भी भारत ने अपनी ऊर्जा यात्रा में संतुलन बनाए रखा। जहाँ आवश्यक था, वहाँ कोयले से मिलने वाली ऊर्जा का उपयोग जारी रखा गया, लेकिन साथ ही स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई गई। यही दूरदर्शिता भारत को ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों की दिशा में आगे ले गई।

एक दिन आरव अपने पुराने विद्यालय पहुँचा। बच्चों ने वही प्रश्न पूछा जो कभी उसने दादाजी से पूछा था—"क्या सूरज पूरे भारत को रोशनी दे सकता है?"

आरव मुस्कुराया और बोला, "सूरज अकेला नहीं, बल्कि हमारी सोच, विज्ञान और मेहनत मिलकर पूरे भारत को उज्ज्वल भविष्य दे सकते हैं। कोयले ने हमें विकास की राह दिखाई और सौर ऊर्जा हमें टिकाऊ भविष्य की ओर ले जा रही है।"

विद्यालय तालियों से गूँज उठा।

उस दिन आरव ने बच्चों से एक संकल्प भी दिलवाया—

"ऊर्जा बचाएँगे, स्वच्छ ऊर्जा अपनाएँगे और भारत को आत्मनिर्भर तथा पर्यावरण-अनुकूल राष्ट्र बनाने में अपना योगदान देंगे।"

सूरज धीरे-धीरे आकाश में ऊपर चढ़ चुका था। उसकी किरणें मानो पूरे भारत से कह रही थीं—

"विकास की यात्रा जारी है। कोयले की शक्ति ने हमें आगे बढ़ाया, और अब सौर ऊर्जा हमें हरित, स्वच्छ और आत्मनिर्भर भारत की ओर ले जा रही है।"

आज जन-जन के मन यह विचार संचारित हो गया कि

प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग, वैज्ञानिक सोच और स्वच्छ ऊर्जा को अपनाकर ही भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर, समृद्ध और पर्यावरण-सुरक्षित राष्ट्र बन सकता है।


✍️मिलन मलरिहा 

मीनी माता (मिनाक्षी)

 ((गुरु घासीदास की बहू  (पुत्रवधू) थी मीनी माता)) 

1952, 1957, 1962, 1967 और 1971  में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर सांसद चुनी गईं।





मिनीमाता का जन्म 1913 में असम के नौगांव में हुआ था। उनकी मूल नाम मीनाक्षी देवी था। छत्तीसगढ में 1901 से 1910 के बीच पड़े भीषण अकाल के दौरान उनके परिवार के लोगों को असम के चाय बगान में मजदूरी के लिए जाना पड़ा था। रेलगाड़ी से असम जाते समय उनकी दो बहनें ट्रेन में ही चल बसीं थीं। उनका बचपन काफी गरीबी में गुजरा। उनका विवाह छत्तीसगढ़ के सतनामी पंथ के महान संत गुरुघासी दास से पुत्र गुरु अगम दास के संग हुआ था।

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11 अगस्त 1972 का दिन छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक ऐसी पीड़ा लेकर आया, जिसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता। इसी दिन छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद, समाज सुधारक और वंचितों की सशक्त आवाज मिनीमाता जी का एक विमान दुर्घटना में असामयिक निधन हो गया। भोपाल से दिल्ली जाते हुए पालम हवाई अड्डे के निकट हुई इस दुर्घटना ने केवल एक जनप्रतिनिधि को नहीं छीना, बल्कि छत्तीसगढ़ ने अपनी एक ममतामयी, संघर्षशील और संवेदनशील जननेत्री खो दी।

मिनीमाता जी का मूल नाम मीनाक्षी था। उनका जन्म 15 मार्च 1913 को असम के नौगाँव क्षेत्र में हुआ था। विवाह के बाद वे छत्तीसगढ़ आईं और यहीं सामाजिक सरोकारों तथा जनसेवा से उनका गहरा जुड़ाव बना। वर्ष 1952 में वे लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं और छत्तीसगढ़ क्षेत्र से संसद पहुँचने वाली पहली महिला सांसद के रूप में उन्होंने इतिहास रचा। इसके बाद भी उन्होंने लगातार जनता की आवाज संसद तक पहुँचाई।

उनका राजनीतिक जीवन केवल चुनाव जीतने और संसद में बैठने तक सीमित नहीं था। वे समाज के उन लोगों की आवाज बनीं, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करना पड़ा। अस्पृश्यता उन्मूलन, महिलाओं की शिक्षा, बाल विवाह, दहेज प्रथा और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने निरंतर आवाज उठाई। संसद में अस्पृश्यता निवारण से जुड़े कानून के लिए उनके योगदान को विशेष रूप से याद किया जाता है।

मिनीमाता जी का व्यक्तित्व राजनीति से कहीं बड़ा था। वे गरीबों, मजदूरों, महिलाओं और वंचित वर्गों के दुख-दर्द को समझती थीं। उनके दिल्ली स्थित निवास को जरूरतमंद लोगों के लिए आश्रय जैसा बताया जाता है। छत्तीसगढ़ से दिल्ली पहुँचने वाला कोई व्यक्ति यदि सहायता चाहता, तो मिनीमाता के द्वार उसके लिए खुले रहते थे। यही कारण था कि वे केवल ‘सांसद’ नहीं रहीं—वे जनता के बीच ‘ममतामयी मिनीमाता’ बन गईं।

छत्तीसगढ़ के विकास से जुड़े अनेक विषयों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। कृषि और सिंचाई के लिए हसदेव बाँगो परियोजना, भिलाई इस्पात संयंत्र में स्थानीय लोगों के रोजगार, मजदूर हितों तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रयासों को आज भी स्मरण किया जाता है। उनके नाम से जुड़ा मिनीमाता #बांगो_बाँध भी उनकी विकास-दृष्टि की स्मृति से जुड़ा हुआ है।

और फिर आया वह मनहूस दिन—11 अगस्त 1972।

मिनीमाता जी भोपाल से दिल्ली की यात्रा पर थीं। दिल्ली के #पालम हवाई अड्डे के निकट विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और ममतामयी जननेत्री सदा के लिए हमसे बिछुड़ गईं।

 संसद के तत्कालीन कार्यवाही अभिलेख में भी उनके निधन पर सदस्यों द्वारा गहरा शोक व्यक्त किया गया था। श्रद्धांजलि देते हुए उनके सामाजिक और राजनीतिक योगदान को याद किया गया तथा उनके निधन को देश और विशेषकर छत्तीसगढ़ के लिए बड़ी क्षति माना गया।

उनकी मृत्यु ने एक प्रश्न छोड़ दिया—क्या किसी व्यक्ति का जीवन उसके चले जाने के साथ समाप्त हो जाता है?

मिनीमाता का जीवन इसका उत्तर देता है—नहीं।

जो व्यक्ति समाज के लिए जीता है, वह अपनी मृत्यु के बाद भी अपने विचारों, संघर्षों और कार्यों में जीवित रहता है। मिनीमाता आज भी छत्तीसगढ़ की सामाजिक चेतना का हिस्सा हैं। महिलाओं के उत्थान और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उनके नाम पर मिनीमाता सम्मान स्थापित किया गया है।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस विचार को याद करना है कि संसद की शक्ति तभी सार्थक है, जब वह अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बने। यह उस संघर्ष को याद करना है, जिसमें जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, अशिक्षा, दहेज और महिलाओं के शोषण के विरुद्ध एक महिला ने अपने समय की रूढ़ियों को चुनौती दी।

मिनीमाता का विमान दुर्घटना में निधन हुआ था, लेकिन उनकी विचारधारा कभी दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुई।

उनकी आवाज आज भी सामाजिक न्याय की माँग में सुनाई देती है।

उनकी ममता आज भी छत्तीसगढ़ की जनचेतना में महसूस होती है।

उनका संघर्ष आज भी आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाता है।

पुण्यतिथि पर ममतामयी मिनीमाता जी को शत्-शत् नमन।



“देह चली गई, पर जनसेवा का वह दीप आज भी जल रहा है;

मिनीमाता केवल इतिहास नहीं, छत्तीसगढ़ की जीवित स्मृति हैं।”



11 अगस्त 1972 को मिनीमाता जी की मृत्यु भोपाल से दिल्ली जाते समय पालम हवाई अड्डे के निकट विमान दुर्घटना में हुई थी। लोकसभा के तत्कालीन अभिलेख में भी 11 अगस्त की विमान दुर्घटना और उनके निधन पर श्रद्धांजलि दर्ज है।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

गुरुदेव अरुण कुमार निगम को जन्मदिन की हार्दिक बधाई 🎂

 04 अगस्त 2026



 छ्न्द विधा के  पुरोधा आदरणीय छन्दविद् अरुण कुमार निगम गुरुदेव के श्रीचरणों में सादर प्रणाम।

छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा में छन्द-विधा के संरक्षण, संवर्धन और पुनर्स्थापन का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, आदरणीय अरुण कुमार निगम का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। जनकवि कोदूराम ‘दलित’ की समृद्ध साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए आपने उस समय छन्द-साधना का दीप प्रज्वलित किया, जब यह विधा धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही थी।

आपके अथक प्रयासों से "छन्द के छ" जैसे अभिनव अभियान ने असंख्य साहित्य साधकों को छन्दशास्त्र से जोड़ा। आपका छत्तीसगढ़ी छन्द-संग्रह "छन्द के छ" (2015) न केवल पचास प्रकार के छन्दों का संकलन है, बल्कि छन्द-रचना की विधि का एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक ग्रंथ भी है। आपके मार्गदर्शन में आज सैकड़ों कवि छत्तीसगढ़ी में शताधिक छन्दों की सशक्त रचना कर रहे हैं। यह आपकी साधना, समर्पण और साहित्य-सेवा का अनुपम परिणाम है।

आपका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, यश और निरंतर सृजन-शक्ति प्रदान करें, ताकि आपकी छन्द-साधना की यह अविरल धारा आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित करती रहे।

जन्मदिन की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ एवं हार्दिक बधाई, गुरुदेव!

आपका स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन हम सब पर सदैव बना रहे। 🌹🙏🎂



  संस्कृत के प्रथम आदि कवि वाल्मीकि से निस्सृत काव्य की धारा कालिदास से होते हुए हिन्दी के अनेक प्राचीन कवियों ने संवारा और छंदों की शक्ल में चन्दबरदायी,  कबीर, तुलसीदास, रहीम, गिरधर कविराय, सूरदास, पद्माकर, केशवदास, भिखारीदास आदि कवियों ने कालजयी साहित्य की रचना की।
छन्द शास्त्र के प्रणेता आचार्य पिंगल को माना गया है। इनका समय 200 ई.पू. माना जाता है। पिंगल मुनि के ग्रंथ का नाम ‘छन्दः सूत्रम्’ है, यह संस्कृत में है। यहाँ से प्रारंभ होकर 1883 ई. में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ कृत ‘छन्दः प्रभाकर’ आधुनिक हिन्दी के छन्द शास्त्र के व्याकरण की प्रथम पुस्तक है।
छत्तीसगढ़ के माटी के सपूत जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’, बाबू रेवाराम, खूबर दयाल, श्याम सुन्दर बाजपेयी ने आधुनिक हिन्दी काव्य साहित्य में हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, अनुप शर्मा के समानान्तर छन्दों की रचना की।





संस्कृत से हिन्दी और छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य में अंतःसलिला के रूप में प्रवाहित छन्द साहित्य पं. सुन्दरलाल शर्मा, महाकवि कपिलनाथ कश्यप, जनकवि कोदूराम ‘दलित’ से होते हुए आधुनिक छत्तीसगढ़ी कवि बुधराम, अरुण निगम तक पहुँची और वर्तमान में छन्दों में छत्तीसगढ़ी काव्य की रचना करने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिनमें श्रीमती शकुन्तला शर्मा, चौवाराम वर्मा ‘बादल’, रमेश कुमार सिंह चौहान, बसन्ती वर्मा, जितेन्द्र वर्मा ‘खैरझिटिया’, सूर्यकान्त गुप्त, दिलीप कुमार वर्मा, सुखदेव सिंह अहिलेश्वर, कन्हैया साहू ‘अमित’, बलराम चन्द्राकर, गजानंद पात्रे ‘सत्यबोध’ मिलन मलरिहा , हेमलाल साहू सहित दो सौ से ज्यादा कवि शामिल हैं, जो शताधिक छन्दों का प्रयोग छत्तीसगढ़ी काव्य लेखन में कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ी में विलुप्त हो रहे ‘छन्द विद्या’ को पुनर्स्थापित करने का महती कार्य जनकवि कोदूराम ‘दलित’ के सुपुत्र अरुण निगम द्वारा ‘छन्द के छ’ के माध्यम से किया जा रहा है। #अरुण_निगम_के छत्तीसगढ़ी छन्द संग्रह ‘छन्द के छ’ (2015) में पचास प्रकार के छन्दों की रचना व रचना-विधान एवं चौवाराम वर्मा ‘बादल’ के छत्तीसगढ़ी छन्द संग्रह ‘छन्द बिरवा’ (2018) में अड़तालीस प्रकार के छन्दों की रचना, रचना-विधान सहित प्रकाशित है। 
छत्तीसगढ़ी छन्द साहित्य के लिए छ्न्द के छ आनलाईन गुरुकुल एक वरदान सिद्ध हुआ।
✍️ मिलन मलरिहा 



गुरुदेव को जन्मदिन की पुनः बधाई, सादर प्रणाम 🙏 



मिलन मलरिहा 

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मंगलवार, 12 मई 2026

छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास म पत्र-पत्रिका मन के योगदान:-


 छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास म पत्र-पत्रिका मन के योगदान:-

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छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास म पत्र-पत्रिका मन के योगदान बड़ महत्वपूर्ण अउ अविस्मरणीय हवय। जऊन समय छत्तीसगढ़ी भाषा ला केवल बोली माने जावत रहिस, ओ समय पत्र-पत्रिका मन ह भाषा, साहित्य अउ संस्कृति के संरक्षण अउ संवर्धन म महती भूमिका निभाइन। ए मन न केवल रचनाकार मन ला मंच प्रदान करिन, बल्कि छत्तीसगढ़ी अस्मिता, लोकजीवन अउ लोकसंस्कृति ला जन-जन तक पहुँचाइन।

प्रारंभिक दौर अउ साहित्यिक चेतना

छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रारंभिक दौर म लिखित साहित्य कम रहिस। लोकगीत, लोककथा, गम्मत, पंडवानी जइसने लोकविधा मन के माध्यम ले साहित्य जीवित रहिस। फेर जब पत्र-पत्रिका मन के प्रकाशन सुरू होइस, तब छत्तीसगढ़ी भाषा ला लिखित रूप म मजबूती मिलिस।

बीसवीं सदी म कई साहित्यिक पत्रिका मन छत्तीसगढ़ी रचनाकार मन बर प्रेरणा स्रोत बनिन। ए पत्रिका मन कविता, कहानी, नाटक, निबंध, व्यंग्य, लोकसाहित्य अउ आलोचना जइसने विधा मन ला स्थान दीन। एखर से नवा लेखक मन सामने आइन अउ साहित्यिक वातावरण बने लगिस।

पत्र-पत्रिका मन के प्रमुख योगदान

1. छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण

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पत्र-पत्रिका मन ह छत्तीसगढ़ी भाषा के शब्द, मुहावरा अउ लोकभाषिक शैली ला बचाय रखे म महत्वपूर्ण भूमिका निभाइन। जऊन शब्द मन धीरे-धीरे लुप्त होत रहिन, ओ मन साहित्यिक लेखन के माध्यम ले पुनः जीवित होइन।

2. नवोदित साहित्यकार मन ला मंच-

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अनेक नवोदित कवि, कहानीकार अउ लेखक मन ला पहिली पहचान पत्र-पत्रिका के माध्यम ले मिलिस। गाँव-गाँव के प्रतिभा मन अपन रचना प्रकाशित करवाके साहित्यिक दुनिया म जगह बनाइन।

3. लोकसंस्कृति के प्रचार-

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छत्तीसगढ़ी पत्रिका मन ह तीज-त्योहार, लोककला, लोकगीत, रीति-रिवाज अउ ग्रामीण जीवन के चित्रण कर के लोकसंस्कृति ला संरक्षित करिन। एखर से नवा पीढ़ी अपन संस्कृति ले जुड़त गइस।

4. सामाजिक जागरूकता-

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पत्र-पत्रिका मन म प्रकाशित लेख अउ रचना मन समाजिक बुराई, अशिक्षा, अंधविश्वास, छुआछूत अउ गरीबी जइसने विषय मन ऊपर जनजागरण करिन। साहित्य समाज सुधार के माध्यम बनिस।

5.साहित्यिक विमर्श अउ आलोचना-

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पत्र-पत्रिका मन साहित्यिक बहस अउ आलोचना बर मंच बनिन। एखर से साहित्य के गुणवत्ता बढ़िस अउ लेखक मन ला दिशा मिलिस।

छत्तीसगढ़ म अनेक साहित्यिक पत्रिका मन समय-समय म प्रकाशित होवत रहिन, जऊन मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला समृद्ध करिन। "मयारु माटी", “छत्तीसगढ़ मित्र”, “लोकाक्षर”, “सोनहा बिहान” जइसने पत्रिका मन साहित्यिक चेतना फैलाय म महत्वपूर्ण रहिन।

ए मन म प्रकाशित रचना मन ले साहित्यकार मन ला पहचान मिलिस अउ छत्तीसगढ़ी भाषा ला व्यापक सम्मान प्राप्त होइस।


आज डिजिटल युग म भी पत्र-पत्रिका मन के महत्व कम नइ होय हवय। मुद्रित पत्रिका संग-संग ऑनलाइन पत्रिका, ब्लॉग अउ सोशल मीडिया मंच मन भी छत्तीसगढ़ी साहित्य ला नवा दिशा देत हवंय। नवा पीढ़ी के लेखक मन इंटरनेट के माध्यम ले अपन रचना दुनिया भर म पहुँचात हवंय।


छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास म पत्र-पत्रिका मन ह आधार स्तंभ के काम करे हवंय। ए मन भाषा के संरक्षण, साहित्यिक सृजन, सांस्कृतिक संवर्धन अउ सामाजिक जागरूकता म अमूल्य योगदान दीन हवंय। वास्तव म, पत्र-पत्रिका बिना छत्तीसगढ़ी साहित्य के वर्तमान स्वरूप संभव नइ रहितीच।


✍️मिलन मलरिहा 

मल्हार बिलासपुर (छग)


शनिवार, 25 अप्रैल 2026


मिलन मलरिहा (मिलन कांत)

फोटो दिनांक - 25/4/2026 खरसिया 

फोटो क्लिक -दीपेश swc Khs



मंगलवार, 20 जनवरी 2026

मुसकराज

 यह कहानी किसी सामान्य चूहे की नहीं, बल्कि 'मिस्टर मुसकराज' की है, जो अपनी पूंछ से फाइलें पलटता था और अपनी मूंछों से बड़े-बड़े घोटाले सूंघ लेता था।

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 मिस्टर मुसकराज ने सरकारी गोदामों और बैंक के सर्वरों में ऐसी सेंध लगाई कि सात करोड़ का अनाज और फंड डकार लिया। जब जांच शुरू हुई, तो वह किसी जहाज के आलीशान केबिन में छिपकर स्विट्जरलैंड और दुबई जैसे देशों के 'विदेशी दौरे' पर निकल गया। वह वहां की आलीशान होटलों की रसोई में सबसे महंगी पनीर खाता और अपनी सेल्फी 'रैट-ग्राम' पर डालता।

 इधर शहर की बिल्लियां, जो साल भर से भूखी थीं, यह देखकर आगबबूला हो गईं। उन्होंने तय किया कि अब वे चूहों का पीछा गलियों में नहीं, बल्कि 'ग्लोबल लेवल' पर करेंगी।

 द ग्रेट कैट समिट (बिल्लियों का महासम्मेलन)

 शहर के एक पुराने कोल्ड स्टोरेज के पीछे एक गुप्त बैठक हुई। इसमें तीन मुख्य बिल्लियों ने कमान संभाली:

 बिल्लो रानी (रणनीति विशेषज्ञ): जो फाइलों को पढ़ने में माहिर थी।

 टाइगर (फील्ड एजेंट): एक हट्टा-कट्टा बिल्ला जो छलांग लगाने में उस्ताद था।

 लुसी (तकनीकी विशेषज्ञ): एक विदेशी नस्ल की बिल्ली जो लैपटॉप चलाना जानती थी।

 योजना (ऑपरेशन जाल):

बिल्लो रानी ने कहा, "मुसकराज को अनाज का लालच नहीं है, उसे 'दिखावे' की बीमारी है। हम उसे पकड़ने के लिए एक फर्जी 'इंटरनेशनल बिजनेस चूहा अवार्ड्स' का आयोजन करेंगे।"

 जाल बिछाया गया

 लुसी ने एक फर्जी वेबसाइट बनाई और मुसकराज को ईमेल भेजा -- "बधाई हो! आपको 'सदी का सबसे प्रभावशाली चूहा' चुना गया है। सम्मान ग्रहण करने के लिए पेरिस के पास एक गुप्त टापू पर आएं।"

 मुसकराज लालच में आ गया। उसे लगा कि अब उसकी शोहरत सात समंदर पार और बढ़ जाएगी। वह अपने प्राइवेट जेट

 (जो असल में एक मालगाड़ी का डिब्बा था) से तय जगह पर पहुंचा।

(( अनोखा क्लाइमेक्स))

 जैसे ही मुसकराज रेड कार्पेट पर चला, वहां कोई फोटोग्राफर नहीं था। अचानक चारों तरफ से 'म्याऊं' की आवाजें गूंज उठीं। बिल्लियों ने उसे घेर लिया था।

 मुसकराज कांपते हुए बोला, "रुको! तुम मुझे नहीं मार सकतीं। मेरे पास सात करोड़ का हिसाब है। अगर मुझे कुछ हुआ, तो वो पैसा किसी को नहीं मिलेगा।"

 बिल्लो रानी मुस्कुराई और बोली, "हमें तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए मुसकराज। हमें तो वह 'पासवर्ड' चाहिए जिससे तुम उन विदेशी गोदामों का दरवाजा खोलते हो। हम अब चूहे नहीं खातीं, हम अब सीधे 'सिस्टम' का हिस्सा बनेंगी।"

 कहानी का मोड़: बिल्लियों ने मुसकराज को पुलिस को सौंपने के बजाय उसे अपना 'फाइनेंशियल एडवाइजर' बना लिया। मुसकराज अब जेल में नहीं, बल्कि बिल्लियों के आलीशान दफ्तर में बैठकर उनके लिए नए-नए 'शिकार' खोजने लगा।


 शिक्षा:-

 आज के जमाने में दुश्मन भी तब तक ही दुश्मन रहते हैं, जब तक बीच में 'फायदा' न आ जाए। एक बार मलाई का हिस्सा मिल जाए, तो बिल्ली और चूहा एक ही थाली में दूध पीने लगते हैं।

 

✍️मिलन मलरिहा 

20/1/26

सोमवार, 12 जनवरी 2026

दाऊ रामचंद्र देशमुख।। पुण्यतिथि १३ जनवरी

 

13 जनवरी पुण्यतिथि
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छत्तीसगढ़ लोक कला के उद्धारक और छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक पुनर्जागरण अग्रदूत की उपाधी से सम्मानित रामचंद्र देशमुख का जन्म 25 अक्टूबर 1916 में दुर्ग जिले के ग्राम बघेरा पिनकापारा में हुआ था। आपके पिता श्री गोविंद प्रसाद एक संपन्न किसान थे। बचपन से ही आपको नाचा देखने का शौक था और आप स्वयं गांव के नाटकों में अभिनय किया करते थे । आपकी शिक्षा (बीएससी कृषि) नागपुर विश्वविद्यालय से हुई। तत्पश्चात अपने एलएलबी की परीक्षा भी नागपुर में से दिल्ली से उत्तीर्ण की। आपका विवाह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी डॉक्टर खूबचंद बघेल की पुत्री राधाबाई से हुआ । 1950 में आपने अपने सहयोगियों के साथ छत्तीसगढ़ी संस्कृति को संस्था के माध्यम से विकसित करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ #देहाती_कला_मंच का गठन किया जिसका उद्देश्य
#नसीहत_का_नसीहत_और_तमाशा_का_तमाशा था ।। आपने नाच लोकनाट्य शैली को परिष्कृत कर उसे सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया। इसके अंतर्गत आपने #काली_माटी,  #बंगाल_का_अकाल #सरग_और_नरक , #राय_साहब, #मिस्टर_भोंदू_खान_साहब , #नालायक_अली_खान और #मिस_मेरी_का_डांस#एक_रात_का_स्त्री_राज जैसे प्रभावी प्रहसनों का मंचन किया। आपके संगठन में कई प्रसिद्ध कलाकार शामिल थे। वर्ष 1954 से 1969 तक आपने अपना संपूर्ण समय लोक सेवा और छत्तीसगढ़ी संस्कृति के उत्थान में लगाया। अपने वर्ष 1971 में #चंदैनी_गोंदा_पार्टी का गठन किया।  यह पार्टी न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुई। इसके गीत संगीत की मधुरता आज तक छत्तीसगढ़ी अंचल में व्याप्त है। 1984 में प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी की कहानी #कारी का मंचन किया । जिसमें आपने नारी उत्पीड़न तथा सामाजिक कुरीतियों पर कठोर प्रहार किया।  इसके बाद आपने #देवार_डेरा का मंचन किया जो तत्कालीन समाज में अपेक्षित देवार जाति की समस्याओं पर आधारित थी। लगभग 50 वर्षों तक छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य एवं लोकमंच से जुड़े रहने के बाद आप छत्तीसगढ़ी कला जगत को 13 जनवरी 1998 को छोड़ गये।
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत को शत शत नमन ✨🙏

✍️मिलन मलरिहा
(चंदैनी गोंदा छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा-व्यक्तित्व एवं कृतित्व - डाॅ सुरेश देशमुख जी के किताब से)

चंदैनी गोंदा - कार्यक्रम दिल्ली 


सोमवार, 8 दिसंबर 2025

लौट आया हूॅं उसी जगह आठ वर्षों बाद...

जशपुर से रायगढ़ स्थानांतरण 02/12/2025


 लौट आया हूँ उसी जगह आठ वर्षों के बाद..

जैसे थमा हुआ समय, अब दे रहा है दाद।

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गली वही, पर चेहरा बदला, धुंधला है आकाश,

स्मृतियों की धूल में लिपटे, ढूँढूँ मैं अतीत का वास।

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 वो नीम का पेड़ अब भी खड़ा है, पर शाखें कुछ और बढ़ीं,

दहलीज़ पर वो निशान गहरे, जो बचपन में हमने गढ़ीं।

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लगता है, दीवारें भी पूछतीं, "कहाँ गए थे तुम इतने साल?"

आँखों में भर आया पानी, जब मिला स्मृतियों का जंजाल।

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 आठ वर्षों में, कितने मौसम, कितनी रातें गुज़रीं दूर,

कितने चेहरे बदले, कितने हो गए अब तो मजबूर।

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जीवन की दौड़ में भागे थे, मंज़िलें बदलती गईं,

पर इस मिट्टी की पुकार थी, जो अंदर ही अंदर बलती गई।

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 आज यहाँ खड़े होकर महसूसता हूँ, वही अपनापन, वही छाँव,

जैसे वक़्त ने करवट ली हो, पर न बदला हो यह शहर (गाॅंव)

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कुछ तो खोया, कुछ तो पाया, यह सफ़र कैसा विचित्र,

पुराने 'मैं' से मिलने आया, लेकर नया एक चित्र ।।


मिलन मलरिहा 

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

तोला देखे रहेंव........गढ़कलेवा के दुवार मॅं

 

तोला देखे रहेंव, गढ़कलेवा के दुवार मॅं

नाचे रहें तैंहा, करमा के ताल मॅं

ए गोई फुॅंदरा वाली, मया होगे रे,  मया होगे न....

पतरेंगी , कनिहा डोले रे भारी

करधनिया झूमर झूम झूले छनकारी 

तोर कजरी नैना भेदे दिलके पार ला -2

ए गोई फुॅंदरा वाली, मया होगे रे,  मया होगे न....


रुप के दीवाना होंगे मैंहा तोर रानी 

तोर कदम ताल थिरके मांदर थपकानी 

लहरबुंदिया छमछम झुमरे झनकार मॅंं -2

ए गोरी फुॅंदरा वाली, मया होगे रे,  मया होगे न


अरे कहाॅं गये गोरी शहरी भीड़ भाड़ मॅंं 

गिंजरत घूमत खोजेंव  रायपुर बजार मॅं

अगोरा मा बइठे रहेंव, मरीन ड्राइव पार मॅंं 2

ए गोरी फुॅंदरा वाली, मया होगे रे,  मया होगे न


तोला देखे रहेंव, गढ़कलेवा के दुवार मॅं

नाचे रहें तैंहा, करमा के ताल मॅं

ए गोई फुॅंदरा वाली, मया होगे रे,  मया होगे न....


✍️ मिलन मलरिहा 

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

छठ घाट

 छठ पूजा छत्तीसगढ़ म घलो अब धूमधाम ले मनाये जावत हे। बिलासपुर अरपा नदी के तोरवा घाट एकर प्रमुख जघा बनगे हवै। बिलासपुर अरपा घाट अब एशिया के सबले बड़े छठ घाट के नाम ले विख्यात होगे। हर बछर इहाॅं हजारों श्रद्धालुजन जुरियाई के छठ मनाथे अउ ये बछर तो लगभग पचास हजार ले आगर भीड़ देखे ल मिलिस। हर बछर प्रशासन अउ छठ पूजा समिति पाटलीपुत्र संस्कृति विकास मंच आवा-जाही बर सुग्घर व्यवस्था करत आवत हे।



छठ पूजा बर छत्तीसगढ़िया मन के विचार:-

छठ पूजा बिहारी तिहार अउ संस्कृति के परब आय जेन हमर नदिया घाट म कब्जा करे हे। हमर छत्तीसगढ़िया संस्कृति के अपमान आय। हमर पुरखौती चिनहारी तरिया, नरवा, नदिया सबो ल हड़प के अपन संस्कृति ल बिहारी मन जमावत हे अउ जम्मो घाट-घठौंदा ल पोगराके अपन बताके झंडा गाड़के हमरे घाट म हमन ल आय- जाय नइ देवत हे। पररजिहा सरकार उॅंकर मदद करत हे जेन छत्तीसगढ़िया मनला देखे नइ जुड़ावत हे। इहाॅं बाहरी मनके कबजा तो हई हे अउ ओमन हमर पुरखौती चौक चौराहा के नाम, तरिया, नदिया, स्कूल कालेज के नाम हमर पुरखौती देवी देवता, बबा, संत महात्मा के नाम बदल के अपन हिसाब ले रखत हे। उॅंकर ये उदिम छत्तीसगढ़िया के घोर अपमान आय।

पररजिहा मनके बिचार:-

भारत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र आय जिहाॅं सबो धर्म, सम्प्रदाय, संस्कृति के सम्मान विधि सम्मत हे। हमन आजतक कभू दूसर पूजा पाठ संस्कृति के अपमान नइ करे हन। अब हमन खुदे छत्तीसगढ़ के निवासी बन गे हन। संगे संग वो मनखे जेन खुद ला छत्तीसगढ़िया कहत हे तेमन अपन घाट के सदा अपमान करिन हे। कभू नदि घाट के साफ-सफाई नइ करिन अउ जब हमन शासन प्रशासन ले मांग करके अरपा नदी के घाट ल सुग्घर सॅंवारेंन तब एमनके नजर परिच अउ हमर घाट, हमर नदिया कहत हे। अब सुग्घर घाट ल देखके घाट वाले बनत हे अउ पहली घाट-घठौंदा जतर-खतर परे रिहिस तब पुरखौती घाट वाले सियान कहाॅं गॅंवाए रिहिस। हमन छठ पूजा म सूर्य देवता के पूजा छठ मईया के रुप म करथॅंन। जेन संपूर्ण प्रकृति के जनक आय। संगे संग अरपा नदि के घाट घलो हमर प्रकृति दाई आय। हम सब प्रकृति के ही उपासक हॅंन अउ हमन चाहथॅंन सबोझन मिलके छठ दाई के आराधना म हिस्सा लेके प्रकृति उपासक बनय। मतभेद झन करय।

अन्य विचार:- 

छत्तीसगढ़ ही नही सबों कोति के युवा चकाचौंध म हे। जेन कोति रंगीन चमक दिखिस चल देथे। जइसे डांडिया नाचे बर भारी भीड़ रिगबिग रिगबिग नोनी मनके आगू पाछू मटकथे। डांडिया हर गुजरात ले नृत्य आय हे। जेन पूरा भारत भर प्रसिद्ध हे। ठीक अइसने करवाचौथ व्रत, टीबी सीनेमा ले पधारे हे। दाई दीदी मन दिखावा, सजावट, चमक धमक के बिना उपास धास ल छुवय नही। आज के नवा नेवरिया मन बर तिहार अब सजे धजे के मउका जइसे लगथे। ये चकाचौंध चमक धमक के युग आय। धर्म संस्कार, रुप- रंग, पहिनावा लपेटे, बने सॅंवरे भर मात्र 

मनखे के आवश्यकता हर बाढ़गे हे ये पाय के खर्चा घलो बाढे़ हे अउ एला पूरा करे बर आनीबानी के पदारथ करत हे। मतलब बदलाव के बेरा हे युग, बछर, समय, काल, संस्कृति सब बदलत हे। ककरो एकझन के दम नइहे जेन परके संस्कृति ले खिलवाड़ करही। एकर बर पूरा छत्तीसगढि़या जिम्मेदार हे। धरती सब एक हे फेर मनखे अलग-अलग हे। जइसे भारत माता, पाकिस्तान माता, बिहार झारखंड दाई, छत्तीसगढ़ महतारी सब हमर दाई के ही हिस्सा आय। मौसी दाई, बड़का दाई, डोकरी दाई आनीबानी के रुपरंग। 

अब खेत ले पानी बोहागे तब मेढ़ बाॅंधे ले का फायदा, बहुत देरी ले जाग पाय हे छत्तीसगढ़िया। तही बता? भला अपन संस्कृति ला, घाट-घठौंदा ला छत्तीसगढ़िया मन सजा- सवाॅंर के कब रखे हे? ये अरपा घाट म सुग्घर चमक धमक छठ पूजा ले आय हे। महतारी ल छठ सवाॅंगा पहिरे देवा।

 पूरा शहर के गंदगी ला हर बछर डोहारे लेगे के काम करथे अरपा दाई हर। छठ पूजा के दू दिन बने सजे-धजे दिखथे अउ बाकी दिन घाट म दारु बोतल बगरे, फुटे शीशी तितर-बितर दिखथे अउ मछरी चिंगरी धरइया मन आवत-जावत रहिथे। छत्तीसगढ़िया मनखे कभू नदिया-नरवा ल सुग्घर बनाय बर सरकार ले गोहार नइ पारिस। तेकर ले बने हे हमर अरपा घाट छठ मनाथे।

बिलासपुर शहर के जननी अरपा नदिया ला शत शत नमन वंदन अउ जोहार।

✍️मिलन मलरिहा

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शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

भंडारपुरी - सतनाम धार्मिक स्थल #bhandarpuri Dham @Bhandarpuri dham

 Edited By

मिलन मलरिहा 17/10/2025



भंडारपुरी 

@Bhandarpuri_Dham

#bhandarpuri_dham

#@भंडारपुरी धाम

@ BHANDARPURI DHAM

#BHANDAR PURI Dham

#सतनाम धार्मिक केन्द्र 

#सतनाम केन्द्र। 

बुधवार, 10 सितंबर 2025

तइहा पंडवानी विधा के डोकरी दाई, लक्ष्मीबाई बंजारे

 छत्तीसगढ़ मा जब जब मंचीय कला प्रस्तुति के गोठ होथे। तब तब भरथरी के विख्यात गायिका सुरुज बाई खांडे, पंथी के अंतराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध कलाकार देवदास बंजारे। पंडवानी विधा के विख्यात गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई, ऋतु वर्मा अउ पंडवानी विधा के पहली पुरुष वर्ग के प्रसिद्ध कलाकार झाडूराम देवांगन जइसे पुरोधा मनके सुरता तुरते मन मा आ जथे। अभी के समय के लोग-लइका मन पंडवानी गायिका तीजन बाई , पद्मश्री उषा बारले, सम्प्रिया पूजा निषाद, शांति बाई चेलक ल ही जान पाथे। जइसे रुख मा हर ढेखरा, पाना ल पंदोली देवइया थॅंघाली रहिथे अउ पूरा रुख ल बोहईया थाॅंघा अउ थाॅंघा ल बोहईया जरी रथे। 

ठीक अइसने पंदोली के बुता कला-जगत पुरखौती गुरु के बताये रसता रहिथे। जेनला देखके, ओकरे जइसे बने के चाह मन मा धरके नवा कलाकार अपन मेहनत ले बड़े नामी कलाकार बनथे। 

          1960 सदी के बीतत बेरा म मंच के विशिष्ट पहचान पंडवानी के प्रथम यशस्वी पुरुष कलाकार स्व. झाडूराम देवांगन अउ पंथी विधा के नामी कलाकार देवदास बंजारे, प्रथम चर्चित पंडवानी गायिका श्रीमती लक्ष्मीबाई बंजारे रहिन। ये तीनों चर्चित नाम दुर्ग जिला के छोटे छोटे गाॅंव के रहइया आय। ओ बखत एमन दुर्ग जिला के सान कहलावय। आज छत्तीसगढ़ के गौरव हे। दुर्ग जिला साहित्यिक, कलात्मिक  जिला के नाम ले आज तक गौरवान्वित हे। नाचा, गम्मत, रहस, गीत-गोविन्द के पार्टी, चंदैनी गोंदा, कारी, देवार ढेरा, सोनहा बिहान, लोरिक चंदा, लोकरंजनी जइसे किसम - किसम के कला मंच अउ कलाकार ल दुर्ग जिला के पावन माटी हा जनम देय हे। 

 दुर्ग के झाडूराम देवांगन के प्रस्तुति देखके पूनाराम निषाद पंडवानी विधा म आघू बढ़िन। ठीक वइसने 60 वर्ष के लक्ष्मीबाई के प्रभाव महिला कलाकार मन ला पंडवानी कला के प्रति प्रेरित करिस। ओ बखत लक्ष्मीबाई के नाम चारों डहर गुॅंजेमान रहिस तब तीजन बाई हर मात्र आठ-नौ बछर के रहिन होही। अपन कइठन साक्षात्कार म पद्मविभूषण तीजन बाई हर लक्ष्मीबाई ले मोला प्रेरणा मिलिस कहिके ये बात ल स्वीकार करे हे। फेर इतिहास के ओ बेरा गवाही देवत हे कि लक्ष्मीबाई मंच के पहली पंडवानी गायिका नोहॅंय वो प्रथम  महिला पंडवानी गायिका आय। ओकर ले पहली सुखिया बाई कापालिक शैली (खड़ा होके गायन) मा पंडवानी गावत रहिच। सुखिया बाई रायपुर के मुनगी गाॅंव के निवासी रहिन। सुखिया बाई पुरुष मनके वेशभूषा म प्रस्तुति देवय। काबर कि ओ समय पंडवानी के विख्यात कलाकार रावन झीपन गाॅंव वाले ममा-भाॅंचा के जोड़ी बड़ प्रसिद्ध रहय। सुखिया बाई ल लगिस होही कि पंडवानी तो महाभारत के कथा म धर्म -अधर्म, राज-पाठ,लड़ाई-झगरा के किस्सा आय एकरे खातिर एहा वीरता, ओज वाणी ले सजे रहिथे। इही बात ल धरके सुखिया बाई पुरुष सवाॅंगा पहिरके, खुला बदन मंच म चढ़य। सुखियाबाई पुरुष वेषभूषा के खातिर प्रथम महिला पंडवानी गायिका के रुप म जन मानस मा चिनहारित नइ हो पाइस। सुखिया बाई ल जनता पुरुष गायक के रुप म देखिस। प्रथम महिला पंडवानी गायिका के दरजा अउ पंडवानी के पुरखौतिन दाई के गौरव श्रीमती लक्ष्मीबाई बंजारे के नाम हे।
         श्रीमती लक्ष्मीबाई बंजारे ल पंडवानी के पुरखिन दाई एकर बर कहिथे काबर कि ओहर पहली पंडवानी गायिका रहिन जेन हर महिला वेषभूषा मा पंडवानी के प्रस्तुति मंच म करिन। पहली कापालिक शैली म शुरुआत करिस बाद मा वेदमती शैली के साधक बनगे।
         श्रीमती लक्ष्मीबाई बंजारे के गुरु उॅंकर खुदके पिता दयाराम बंजारे रहिन। दयाराम बंजारे के ग्यारा जन बेटा अउ दूझन नोनी म मात्र लक्ष्मीबाई ही बाच पाइस।
सन 1944 बछर के देवारी परब म लक्ष्मी पूजा के दिन लक्ष्मी बाई हा जनम लिस एकरे खातिर उॅंकर नाॅंव लक्ष्मी के नाम मा रखिन। लक्ष्मी तो नाॅंव म रहिन फेर जिनगी हा लक्ष्मी के आभाव म बीतिन। माता फुलकुंवर हा अपन एकलौतिन बेटी लक्ष्मी ल बड़ मया दुलार देइन। 
         चौथी कक्षा ले लक्ष्मी बाई महाभारत, रमायण के परायण करके प्रमुख कथासार के मूल सूत्र ल टमर डर रहिस। 18 दिन तक लगातार पंडवानी गायकी के अनुभव के संग रमायण गायन म घलो बचपन ले कुशल कलात्मक गुण ल धर डरे रहिच।  लक्ष्मीबाई श्रेष्ठ कलाकार के संगेसंग पहली साक्षर महिला कलाकार घलो आय। लगभग पंदरा बछर के उमर ले मंच मा लक्ष्मीबाई पंडवानी गायन करत हे। 
पिता मशाल नाच के प्रख्यात कलाकार रहिच। जेन हर खड़े साज म चिकारा बजावय। बेटी लक्ष्मीबाई बंजारे घलो शुरुआत कापालिक शैली ले करिन बाद मा वेदमती शैली के साधक बनिस। लक्ष्मीबाई के बाद रितु वर्मा वेदमती शैली म आघू बढ़िन। आनिबानी के शैली, टोटका, लटक झटक हा नही बलकी कलाकार अपन साधना के दम मा आगू बढ़थे। लक्ष्मीबाई ल घलो अपन साधना के दम म मंजिल मिलिस। ओहर आकाशवाणी के प्रथम पंडवानी गायिका आय। 1972 ले लक्ष्मीबाई आकाशवाणी म प्रस्तुति देवत आत हे। श्रीमती लक्ष्मीबाई बंजारे हा मोतीबाग, महाराष्ट्र मंडल, आदिवासी लोक कला परिषद् के मंच अउ उदियाचल के आयोजन म पंडवानी के प्रस्तुति देके जन-जनार्दन मनला मंत्रमुग्ध कर अमिट छाप छोड़िस।
         प्रसिद्ध गायक झाडूराम देवांगन ल लक्ष्मीबाई हा ममा कहय काबर कि झाडुराम के गाॅंव बासिंग (दुर्ग) लक्ष्मीबाई के ननिहाल गाॅंव आय। लक्ष्मीबाई ल पिता के संगे संग ममा झाडूराम देवांगन ले घलो मार्गदर्शन मिलत रहय। 
         गिरौदपुरी धाम के मंच मा समाज हर लक्ष्मीबाई ल स्वर्ण पदक ले सम्मानित करिन। सरकार ओला अनचिनहार करिस। लक्ष्मीबाई अपन उपेक्षा ल देख हाॅंसत एकठन टिप्पणी करय:-

"रंग रुप म राजा मोहे, चटक मटक दारी, 
भाव भजन म साधू मोहे, पंडित करौं बिचारी।"

वो कहत रहय - सबके अपन अपन युग होथे, जइसे बेरा साॅंझ होके चले जाते, फेर काम रह जाथे। काम के कीमत सदा होथे। परचार करे ले थोरकन हलचल कलाकार मचा सकथे। परचार ले भला सच्चा सम्मान कहाॅं मिलही।

 लक्ष्मीबाई सत्ता के रवईया सोचके एकठन गीत अपन हिरदय के झलकत दरद ले गावय:-

     " सोना तो बाजय नहीं, कांच पीतल झन्नाय।
       साधू तो बोलते नहीं, मूरख रहे चिल्लाय।।
     धरे हॅंव ध्यान तुम्हारा मैं रघुवर"...........

तइहा बेरा मंच गायन गीत-गोविंद क्षेत्र म नारी जात ल समाजिक निंदा के सामना करे ल परय। गवईया-बजईया ल समाज हर बहेलिया, चटरहा के उपमा देवय। पंडवानी गायन ले जुड़े के बाद लक्ष्मीबाई के बिहाव दाई-ददा बर चिंता के विषय बनगे रहिच। फेर समय के का ओकर मेरा सबके ईलाज हे। दयाराम जी ल एक घरजिया दामांद मिल जथे। ओकर नाम राजिव नयन रहित। दाढ़ीधारी के नाम ले जाने जाय। मंच म झुमका अउ मंजीरा ल बजावत पंडवानी दल ल सम्हालय। 

1950 मा हबीब तनवीर के 'आगरा बाजार', 'चरणदास चोर' नाटक मंच के चरचा पूरा भारत म चलत रहिस। जेन हर आघू चलके सन् 1959 म "नया थियेटर" बनके स्थापित होय रहिस। छत्तीसगढ़ के कलाकार दिल्ली के मंच - नया थियेटर म जाय बर कुलकत रहय। हबीब तनवीर छत्तीसगढ़ के अनेक कलाकार मनला अपन मंच- नया थियेटर म ले जाय बर एक दल तइयार करे रहिस जेमा श्रीमती लक्ष्मीबाई बंजारे के नाम घलो सम्मिलित रहिस। फेर ओही समय लक्ष्मीबाई ल कैंसर बिमारी हर घेर लिस। लक्ष्मीबाई के कला देश-विदेश के मंच म अपन  पंडवानी विधा के छिप नइ छोड़ सकिस।  लक्ष्मीबाई स्वस्थ होके अपन राज म ही पंडवानी के जयकार लगाइस। जेला देख-सुन नवा नवा महिला कलाकार के जन्म होइस।

           कला संगीत के पचास बछर बाद छत्तीसगढ़ लोक कला महोत्सव के विराट मंच म गुरु परंपरा के लोक कलाकार मनके सम्मान होइस। जेमा पंडवानी विधा के गुरु के रुप म श्रीमती लक्ष्मीबाई के सम्मान करिन। लक्ष्मीबाई ये सम्मान पाके मन ल  संतुष्ट करलिच। राज्य अलंकरण खातिर सरकार सम्मान नइ करिन त का होगे। जब कलाकार मन ओला पंडवानी के पुरखिन दाई कहिथे तब लक्ष्मीबाई ल अइसे लगथे जइसे ओला भारत रत्न मिलगे। 
पंडवानी के पुरखिन दाई ल शत शत नमन जोहार हे।


✍️मिलन मलरिहा 
नगर पंचायत मल्हार बिलासपुर छत्तीसगढ़