मंगलवार, 12 मई 2026

छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास म पत्र-पत्रिका मन के योगदान:-


 छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास म पत्र-पत्रिका मन के योगदान:-

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छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास म पत्र-पत्रिका मन के योगदान बड़ महत्वपूर्ण अउ अविस्मरणीय हवय। जऊन समय छत्तीसगढ़ी भाषा ला केवल बोली माने जावत रहिस, ओ समय पत्र-पत्रिका मन ह भाषा, साहित्य अउ संस्कृति के संरक्षण अउ संवर्धन म महती भूमिका निभाइन। ए मन न केवल रचनाकार मन ला मंच प्रदान करिन, बल्कि छत्तीसगढ़ी अस्मिता, लोकजीवन अउ लोकसंस्कृति ला जन-जन तक पहुँचाइन।

प्रारंभिक दौर अउ साहित्यिक चेतना

छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रारंभिक दौर म लिखित साहित्य कम रहिस। लोकगीत, लोककथा, गम्मत, पंडवानी जइसने लोकविधा मन के माध्यम ले साहित्य जीवित रहिस। फेर जब पत्र-पत्रिका मन के प्रकाशन सुरू होइस, तब छत्तीसगढ़ी भाषा ला लिखित रूप म मजबूती मिलिस।

बीसवीं सदी म कई साहित्यिक पत्रिका मन छत्तीसगढ़ी रचनाकार मन बर प्रेरणा स्रोत बनिन। ए पत्रिका मन कविता, कहानी, नाटक, निबंध, व्यंग्य, लोकसाहित्य अउ आलोचना जइसने विधा मन ला स्थान दीन। एखर से नवा लेखक मन सामने आइन अउ साहित्यिक वातावरण बने लगिस।

पत्र-पत्रिका मन के प्रमुख योगदान

1. छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण

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पत्र-पत्रिका मन ह छत्तीसगढ़ी भाषा के शब्द, मुहावरा अउ लोकभाषिक शैली ला बचाय रखे म महत्वपूर्ण भूमिका निभाइन। जऊन शब्द मन धीरे-धीरे लुप्त होत रहिन, ओ मन साहित्यिक लेखन के माध्यम ले पुनः जीवित होइन।

2. नवोदित साहित्यकार मन ला मंच-

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अनेक नवोदित कवि, कहानीकार अउ लेखक मन ला पहिली पहचान पत्र-पत्रिका के माध्यम ले मिलिस। गाँव-गाँव के प्रतिभा मन अपन रचना प्रकाशित करवाके साहित्यिक दुनिया म जगह बनाइन।

3. लोकसंस्कृति के प्रचार-

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छत्तीसगढ़ी पत्रिका मन ह तीज-त्योहार, लोककला, लोकगीत, रीति-रिवाज अउ ग्रामीण जीवन के चित्रण कर के लोकसंस्कृति ला संरक्षित करिन। एखर से नवा पीढ़ी अपन संस्कृति ले जुड़त गइस।

4. सामाजिक जागरूकता-

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पत्र-पत्रिका मन म प्रकाशित लेख अउ रचना मन समाजिक बुराई, अशिक्षा, अंधविश्वास, छुआछूत अउ गरीबी जइसने विषय मन ऊपर जनजागरण करिन। साहित्य समाज सुधार के माध्यम बनिस।

5.साहित्यिक विमर्श अउ आलोचना-

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पत्र-पत्रिका मन साहित्यिक बहस अउ आलोचना बर मंच बनिन। एखर से साहित्य के गुणवत्ता बढ़िस अउ लेखक मन ला दिशा मिलिस।

छत्तीसगढ़ म अनेक साहित्यिक पत्रिका मन समय-समय म प्रकाशित होवत रहिन, जऊन मन छत्तीसगढ़ी साहित्य ला समृद्ध करिन। "मयारु माटी", “छत्तीसगढ़ मित्र”, “लोकाक्षर”, “सोनहा बिहान” जइसने पत्रिका मन साहित्यिक चेतना फैलाय म महत्वपूर्ण रहिन।

ए मन म प्रकाशित रचना मन ले साहित्यकार मन ला पहचान मिलिस अउ छत्तीसगढ़ी भाषा ला व्यापक सम्मान प्राप्त होइस।


आज डिजिटल युग म भी पत्र-पत्रिका मन के महत्व कम नइ होय हवय। मुद्रित पत्रिका संग-संग ऑनलाइन पत्रिका, ब्लॉग अउ सोशल मीडिया मंच मन भी छत्तीसगढ़ी साहित्य ला नवा दिशा देत हवंय। नवा पीढ़ी के लेखक मन इंटरनेट के माध्यम ले अपन रचना दुनिया भर म पहुँचात हवंय।


छत्तीसगढ़ी साहित्य के विकास म पत्र-पत्रिका मन ह आधार स्तंभ के काम करे हवंय। ए मन भाषा के संरक्षण, साहित्यिक सृजन, सांस्कृतिक संवर्धन अउ सामाजिक जागरूकता म अमूल्य योगदान दीन हवंय। वास्तव म, पत्र-पत्रिका बिना छत्तीसगढ़ी साहित्य के वर्तमान स्वरूप संभव नइ रहितीच।


✍️मिलन मलरिहा 

मल्हार बिलासपुर (छग)


शनिवार, 25 अप्रैल 2026


मिलन मलरिहा (मिलन कांत)

फोटो दिनांक - 25/4/2026 खरसिया 

फोटो क्लिक -दीपेश swc Khs



मंगलवार, 20 जनवरी 2026

मुसकराज

 यह कहानी किसी सामान्य चूहे की नहीं, बल्कि 'मिस्टर मुसकराज' की है, जो अपनी पूंछ से फाइलें पलटता था और अपनी मूंछों से बड़े-बड़े घोटाले सूंघ लेता था।

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 मिस्टर मुसकराज ने सरकारी गोदामों और बैंक के सर्वरों में ऐसी सेंध लगाई कि सात करोड़ का अनाज और फंड डकार लिया। जब जांच शुरू हुई, तो वह किसी जहाज के आलीशान केबिन में छिपकर स्विट्जरलैंड और दुबई जैसे देशों के 'विदेशी दौरे' पर निकल गया। वह वहां की आलीशान होटलों की रसोई में सबसे महंगी पनीर खाता और अपनी सेल्फी 'रैट-ग्राम' पर डालता।

 इधर शहर की बिल्लियां, जो साल भर से भूखी थीं, यह देखकर आगबबूला हो गईं। उन्होंने तय किया कि अब वे चूहों का पीछा गलियों में नहीं, बल्कि 'ग्लोबल लेवल' पर करेंगी।

 द ग्रेट कैट समिट (बिल्लियों का महासम्मेलन)

 शहर के एक पुराने कोल्ड स्टोरेज के पीछे एक गुप्त बैठक हुई। इसमें तीन मुख्य बिल्लियों ने कमान संभाली:

 बिल्लो रानी (रणनीति विशेषज्ञ): जो फाइलों को पढ़ने में माहिर थी।

 टाइगर (फील्ड एजेंट): एक हट्टा-कट्टा बिल्ला जो छलांग लगाने में उस्ताद था।

 लुसी (तकनीकी विशेषज्ञ): एक विदेशी नस्ल की बिल्ली जो लैपटॉप चलाना जानती थी।

 योजना (ऑपरेशन जाल):

बिल्लो रानी ने कहा, "मुसकराज को अनाज का लालच नहीं है, उसे 'दिखावे' की बीमारी है। हम उसे पकड़ने के लिए एक फर्जी 'इंटरनेशनल बिजनेस चूहा अवार्ड्स' का आयोजन करेंगे।"

 जाल बिछाया गया

 लुसी ने एक फर्जी वेबसाइट बनाई और मुसकराज को ईमेल भेजा -- "बधाई हो! आपको 'सदी का सबसे प्रभावशाली चूहा' चुना गया है। सम्मान ग्रहण करने के लिए पेरिस के पास एक गुप्त टापू पर आएं।"

 मुसकराज लालच में आ गया। उसे लगा कि अब उसकी शोहरत सात समंदर पार और बढ़ जाएगी। वह अपने प्राइवेट जेट

 (जो असल में एक मालगाड़ी का डिब्बा था) से तय जगह पर पहुंचा।

(( अनोखा क्लाइमेक्स))

 जैसे ही मुसकराज रेड कार्पेट पर चला, वहां कोई फोटोग्राफर नहीं था। अचानक चारों तरफ से 'म्याऊं' की आवाजें गूंज उठीं। बिल्लियों ने उसे घेर लिया था।

 मुसकराज कांपते हुए बोला, "रुको! तुम मुझे नहीं मार सकतीं। मेरे पास सात करोड़ का हिसाब है। अगर मुझे कुछ हुआ, तो वो पैसा किसी को नहीं मिलेगा।"

 बिल्लो रानी मुस्कुराई और बोली, "हमें तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए मुसकराज। हमें तो वह 'पासवर्ड' चाहिए जिससे तुम उन विदेशी गोदामों का दरवाजा खोलते हो। हम अब चूहे नहीं खातीं, हम अब सीधे 'सिस्टम' का हिस्सा बनेंगी।"

 कहानी का मोड़: बिल्लियों ने मुसकराज को पुलिस को सौंपने के बजाय उसे अपना 'फाइनेंशियल एडवाइजर' बना लिया। मुसकराज अब जेल में नहीं, बल्कि बिल्लियों के आलीशान दफ्तर में बैठकर उनके लिए नए-नए 'शिकार' खोजने लगा।


 शिक्षा:-

 आज के जमाने में दुश्मन भी तब तक ही दुश्मन रहते हैं, जब तक बीच में 'फायदा' न आ जाए। एक बार मलाई का हिस्सा मिल जाए, तो बिल्ली और चूहा एक ही थाली में दूध पीने लगते हैं।

 

✍️मिलन मलरिहा 

20/1/26

सोमवार, 12 जनवरी 2026

दाऊ रामचंद्र देशमुख।। पुण्यतिथि १३ जनवरी

 

13 जनवरी पुण्यतिथि
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छत्तीसगढ़ लोक कला के उद्धारक और छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक पुनर्जागरण अग्रदूत की उपाधी से सम्मानित रामचंद्र देशमुख का जन्म 25 अक्टूबर 1916 में दुर्ग जिले के ग्राम बघेरा पिनकापारा में हुआ था। आपके पिता श्री गोविंद प्रसाद एक संपन्न किसान थे। बचपन से ही आपको नाचा देखने का शौक था और आप स्वयं गांव के नाटकों में अभिनय किया करते थे । आपकी शिक्षा (बीएससी कृषि) नागपुर विश्वविद्यालय से हुई। तत्पश्चात अपने एलएलबी की परीक्षा भी नागपुर में से दिल्ली से उत्तीर्ण की। आपका विवाह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी डॉक्टर खूबचंद बघेल की पुत्री राधाबाई से हुआ । 1950 में आपने अपने सहयोगियों के साथ छत्तीसगढ़ी संस्कृति को संस्था के माध्यम से विकसित करने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ #देहाती_कला_मंच का गठन किया जिसका उद्देश्य
#नसीहत_का_नसीहत_और_तमाशा_का_तमाशा था ।। आपने नाच लोकनाट्य शैली को परिष्कृत कर उसे सामाजिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया। इसके अंतर्गत आपने #काली_माटी,  #बंगाल_का_अकाल #सरग_और_नरक , #राय_साहब, #मिस्टर_भोंदू_खान_साहब , #नालायक_अली_खान और #मिस_मेरी_का_डांस#एक_रात_का_स्त्री_राज जैसे प्रभावी प्रहसनों का मंचन किया। आपके संगठन में कई प्रसिद्ध कलाकार शामिल थे। वर्ष 1954 से 1969 तक आपने अपना संपूर्ण समय लोक सेवा और छत्तीसगढ़ी संस्कृति के उत्थान में लगाया। अपने वर्ष 1971 में #चंदैनी_गोंदा_पार्टी का गठन किया।  यह पार्टी न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुई। इसके गीत संगीत की मधुरता आज तक छत्तीसगढ़ी अंचल में व्याप्त है। 1984 में प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी की कहानी #कारी का मंचन किया । जिसमें आपने नारी उत्पीड़न तथा सामाजिक कुरीतियों पर कठोर प्रहार किया।  इसके बाद आपने #देवार_डेरा का मंचन किया जो तत्कालीन समाज में अपेक्षित देवार जाति की समस्याओं पर आधारित थी। लगभग 50 वर्षों तक छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य एवं लोकमंच से जुड़े रहने के बाद आप छत्तीसगढ़ी कला जगत को 13 जनवरी 1998 को छोड़ गये।
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अग्रदूत को शत शत नमन ✨🙏

✍️मिलन मलरिहा
(चंदैनी गोंदा छत्तीसगढ़ की एक सांस्कृतिक यात्रा-व्यक्तित्व एवं कृतित्व - डाॅ सुरेश देशमुख जी के किताब से)

चंदैनी गोंदा - कार्यक्रम दिल्ली