आज कथाकार परदेशी राम वर्मा जी की आत्मकथा ‘सुरंग के उस पार’ पढ़ने का अवसर मिला। पुस्तक का पहला अध्याय ही मन को भीतर तक झकझोर गया। ऐसा लगा जैसे लेखक ने अपने जीवन के पन्ने नहीं, बल्कि समय की उन कठोर स्मृतियों को हमारे सामने खोल दिया है, जिनमें पीड़ा भी है, संघर्ष भी है और जीवन के प्रति अदम्य विश्वास भी।
आत्मकथा में 26 अगस्त 2005 का दिन विशेष रूप से हृदयविदारक है। पुस्तक लोकार्पण के सिलसिले में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मिलने के लिए पंथी सम्राट देवदास बंजारे और परदेशी राम वर्मा जी एक ही मोटरसाइकिल पर रायपुर जा रहे थे। टाटीबंध के पास भारी यातायात के कारण दोनों सड़क के किनारे रुककर रास्ता खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी तेज गति से आती एक मिनीबस ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। इस दुर्घटना ने देवदास बंजारे जी को सदा के लिए हमसे छीन लिया और परदेशी राम वर्मा जी के दाहिने पैर की हड्डी कई जगहों से टूट गई।
यह केवल एक दुर्घटना का वर्णन नहीं है, बल्कि एक ऐसे क्षण का दस्तावेज है, जहाँ जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी अचानक समाप्त हो जाती है।
वर्मा जी की आत्मकथा की विशेषता यही है कि वे मृत्यु को केवल एक घटना की तरह नहीं देखते, बल्कि उसे अपने जीवन के लंबे अनुभवों के रूप में महसूस करते हैं। असम राइफल्स में सेवा के दौरान जवान सहयात्रियों को अपने सामने मृत्यु के मुँह में जाते देखना, जीवन के अनेक प्रियजनों को खोना और बार-बार मृत्यु के सामने खड़े होकर भी जीवन की ओर लौटना—इन अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व को भीतर से गढ़ा है।
अपने ग्यारह भाई-बहनों में आठ को खोने का दर्द हो या 2 मार्च 2016 को संत पवन दीवान के निधन का अनुभव, हर प्रसंग में लेखक का मन अपनी स्मृतियों से संवाद करता दिखाई देता है। सबसे गहरी पीड़ा तब सामने आती है जब वे 12 अक्टूबर 2024 को अपने इकलौते पुत्र आशेश्वर से बिछुड़ने का दुःख साझा करते हैं। पुत्र-वियोग जैसी असहनीय पीड़ा को शब्द देना आसान नहीं होता, लेकिन वर्मा जी ने उसे जिस संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया है, वह पाठक को भीतर तक उद्वेलित करती है।
‘सुरंग के उस पार’ केवल व्यक्तिगत जीवन की कथा नहीं है। यह छत्तीसगढ़ के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास की भी एक महत्वपूर्ण स्मृति-पुस्तक बन जाती है। इसमें हबीब तनवीर, चरणदास चोर, देवदास बंजारे का पंथी प्रदर्शन, दाऊ रामचंद्र देशमुख, सुरेश देशमुख, चंदैनी गोंदा और छत्तीसगढ़ में ‘अनाटक पोंगा पंडित’ को लेकर 1990 के आसपास हुए विरोध जैसे अनेक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रसंगों का उल्लेख मिलता है।
इन प्रसंगों के माध्यम से पाठक केवल लेखक के जीवन को नहीं पढ़ता, बल्कि उस दौर के छत्तीसगढ़ को भी महसूस करता है—उसका लोकजीवन, उसकी कला-संस्कृति, उसके संघर्ष, उसके कलाकार और साहित्यकार तथा बदलते हुए सामाजिक परिवेश को भी देखता है।
आत्मकथा की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ईमानदारी है। लेखक ने अपने जीवन को किसी आदर्शीकृत तस्वीर की तरह प्रस्तुत नहीं किया है। यहाँ दुर्घटना है, मृत्यु है, बिछोह है, संघर्ष है, असहायता है; लेकिन इन सबके बीच जीवन को स्वीकार करने का साहस भी है।
शायद इसीलिए पुस्तक का शीर्षक ‘सुरंग के उस पार’ इतना सार्थक है।
सुरंग अंधकार का प्रतीक है और उसके पार का प्रकाश आशा का। जीवन में कितनी ही विपत्तियाँ क्यों न आएँ, कितने ही
अपने क्यों न बिछड़ जाएँ, कितनी ही बार मनुष्य मृत्यु और निराशा के अंधेरे में क्यों न घिर जाए—जीवन की यात्रा वहीं समाप्त नहीं होती। कहीं न कहीं उस सुरंग के अंत में प्रकाश हमारा इंतजार करता है।
परदेशी राम वर्मा जी की आत्मकथा हमें यही विश्वास देती है कि दुःख जीवन का अंतिम सत्य नहीं है। दुःख के बाद भी जीवन है, स्मृतियों के बाद भी यात्रा है और अंधकार के बाद भी उजाला है।
‘सुरंग के उस पार’ पढ़ते हुए कई बार आँखें नम होती हैं, लेकिन पुस्तक बंद करते समय मन में एक अद्भुत आशा जन्म लेती है—
चलते रहिए...
सुरंग चाहे कितनी भी लंबी हो,
उसके उस पार
चमकता हुआ सूरज अवश्य मिलेगा।
और शायद यही इस आत्मकथा की सबसे बड़ी उपलब्धि है—लेखक अपने जीवन के अंधेरे से गुजरकर पाठकों के लिए उजाले की राह छोड़ जाते हैं।
सुरंग के उस पार...
एक रोशनी है,
एक उम्मीद है,
और जीवन को फिर से जीने का विश्वास है।

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