शनिवार, 15 अगस्त 2026

भारत की उर्जा क्रांति : कोयले से सौर उर्जा तक (((कहानी)))

भारत की उर्जा क्रांति : कोयले से सौर उर्जा तक

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सुबह का समय था। छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव में रहने वाला बारह वर्षीय आरव अपने दादाजी के साथ खेत की मेड़ पर बैठा उगते सूरज को निहार रहा था। दूर क्षितिज पर सुनहरी किरणें फैल रही थीं। आरव ने उत्सुकता से पूछा, "दादाजी, क्या सचमुच यह सूरज पूरे देश को रोशनी दे सकता है?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटा, आज का भारत उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। लेकिन यह यात्रा इतनी आसान नहीं थी।"

आरव की जिज्ञासा बढ़ गई। दादाजी ने कहानी शुरू की।

"आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—हर घर तक बिजली पहुँचाना। उस समय उद्योग कम थे, बिजलीघर भी बहुत कम थे। देश के पास कोयले का विशाल भंडार था। इसलिए बड़े-बड़े ताप विद्युत संयंत्र बने। झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ की खदानों से निकलने वाला कोयला देश के बिजलीघरों तक पहुँचने लगा।"

"क्या वही बिजली हमारे घरों तक आती थी?" आरव ने पूछा।

"हाँ," दादाजी बोले, "कोयले ने भारत के विकास की नींव रखी। कारखाने चले, रेलगाड़ियाँ दौड़ीं, शहर जगमगाए और गाँवों तक बिजली पहुँची। लेकिन समय के साथ यह भी समझ में आया कि कोयले के अत्यधिक उपयोग से धुआँ बढ़ता है, पर्यावरण प्रदूषित होता है और धरती का तापमान भी बढ़ने लगता है।"

आरव कुछ सोच में पड़ गया।

दादाजी आगे बोले, "भारत ने हार नहीं मानी। वैज्ञानिकों ने नई राह खोजनी शुरू की। उन्होंने सोचा कि प्रकृति ने हमें सूरज, हवा और पानी जैसी अनमोल शक्तियाँ दी हैं। यदि इन्हें सही ढंग से उपयोग किया जाए तो ऊर्जा भी मिलेगी और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।"

उसी समय सूरज की किरणें खेतों में लगे सौर पंप पर पड़ीं। मोटर चलने लगी और पानी बहने लगा।

"देखो," दादाजी ने कहा, "यह है सौर ऊर्जा की ताकत।"

आरव की आँखें चमक उठीं।

कुछ दिनों बाद विद्यालय में विज्ञान प्रदर्शनी आयोजित हुई। आरव ने "भारत की ऊर्जा यात्रा" विषय पर मॉडल बनाया। मॉडल के एक भाग में कोयले से चलने वाला ताप विद्युत संयंत्र था और दूसरे भाग में सौर पैनल, पवन चक्कियाँ तथा जलविद्युत परियोजनाएँ थीं।

प्रदर्शनी में आए मुख्य अतिथि ने आरव से पूछा, "तुम्हारे अनुसार भारत का भविष्य किस ऊर्जा में है?"

आरव ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया, "सर, कोयले ने भारत के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया है। लेकिन भविष्य स्वच्छ ऊर्जा का है। हमें कोयले का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाना चाहिए।"

मुख्य अतिथि मुस्कुराए। उन्होंने कहा, "यही सोच नए भारत की पहचान है।"

आरव को प्रथम पुरस्कार मिला।

कुछ वर्षों बाद आरव ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में कार्य करने लगा। उसका पहला प्रोजेक्ट एक ऐसे गाँव में था जहाँ बिजली की समस्या वर्षों से बनी हुई थी।

गाँव के स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और घरों की छतों पर सौर पैनल लगाए गए। रात में पहली बार पूरा गाँव रोशनी से जगमगा उठा। बच्चों के चेहरे पर खुशी थी। महिलाएँ आसानी से घर का काम करने लगीं और किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली मिलने लगी।

उस रात गाँव के बुजुर्गों ने कहा, "पहले बिजली का इंतजार करते थे, अब सूरज हमारी ताकत बन गया है।"

आरव की आँखों में दादाजी की बातें ताज़ा हो गईं। उसे याद आया कि कैसे उन्होंने कहा था—"विकास का अर्थ केवल अधिक बिजली बनाना नहीं, बल्कि ऐसी ऊर्जा चुनना है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहे।"

समय बीतता गया। भारत ने दुनिया के सामने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में नई पहचान बनाई। विशाल सौर पार्क बने, रेगिस्तानों में सौर पैनलों की कतारें दिखाई देने लगीं, समुद्र तटों और पहाड़ों पर पवन चक्कियाँ घूमने लगीं। गाँव-गाँव में सौर स्ट्रीट लाइटें, सौर पंप और रूफटॉप सोलर सिस्टम लगने लगे।

फिर भी भारत ने अपनी ऊर्जा यात्रा में संतुलन बनाए रखा। जहाँ आवश्यक था, वहाँ कोयले से मिलने वाली ऊर्जा का उपयोग जारी रखा गया, लेकिन साथ ही स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई गई। यही दूरदर्शिता भारत को ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों की दिशा में आगे ले गई।

एक दिन आरव अपने पुराने विद्यालय पहुँचा। बच्चों ने वही प्रश्न पूछा जो कभी उसने दादाजी से पूछा था—"क्या सूरज पूरे भारत को रोशनी दे सकता है?"

आरव मुस्कुराया और बोला, "सूरज अकेला नहीं, बल्कि हमारी सोच, विज्ञान और मेहनत मिलकर पूरे भारत को उज्ज्वल भविष्य दे सकते हैं। कोयले ने हमें विकास की राह दिखाई और सौर ऊर्जा हमें टिकाऊ भविष्य की ओर ले जा रही है।"

विद्यालय तालियों से गूँज उठा।

उस दिन आरव ने बच्चों से एक संकल्प भी दिलवाया—

"ऊर्जा बचाएँगे, स्वच्छ ऊर्जा अपनाएँगे और भारत को आत्मनिर्भर तथा पर्यावरण-अनुकूल राष्ट्र बनाने में अपना योगदान देंगे।"

सूरज धीरे-धीरे आकाश में ऊपर चढ़ चुका था। उसकी किरणें मानो पूरे भारत से कह रही थीं—

"विकास की यात्रा जारी है। कोयले की शक्ति ने हमें आगे बढ़ाया, और अब सौर ऊर्जा हमें हरित, स्वच्छ और आत्मनिर्भर भारत की ओर ले जा रही है।"

आज जन-जन के मन यह विचार संचारित हो गया कि

प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग, वैज्ञानिक सोच और स्वच्छ ऊर्जा को अपनाकर ही भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर, समृद्ध और पर्यावरण-सुरक्षित राष्ट्र बन सकता है।


✍️मिलन मलरिहा 

मीनी माता (मिनाक्षी)

 ((गुरु घासीदास की बहू  (पुत्रवधू) थी मीनी माता)) 

1952, 1957, 1962, 1967 और 1971  में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर सांसद चुनी गईं।





मिनीमाता का जन्म 1913 में असम के नौगांव में हुआ था। उनकी मूल नाम मीनाक्षी देवी था। छत्तीसगढ में 1901 से 1910 के बीच पड़े भीषण अकाल के दौरान उनके परिवार के लोगों को असम के चाय बगान में मजदूरी के लिए जाना पड़ा था। रेलगाड़ी से असम जाते समय उनकी दो बहनें ट्रेन में ही चल बसीं थीं। उनका बचपन काफी गरीबी में गुजरा। उनका विवाह छत्तीसगढ़ के सतनामी पंथ के महान संत गुरुघासी दास से पुत्र गुरु अगम दास के संग हुआ था।

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11 अगस्त 1972 का दिन छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक ऐसी पीड़ा लेकर आया, जिसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता। इसी दिन छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद, समाज सुधारक और वंचितों की सशक्त आवाज मिनीमाता जी का एक विमान दुर्घटना में असामयिक निधन हो गया। भोपाल से दिल्ली जाते हुए पालम हवाई अड्डे के निकट हुई इस दुर्घटना ने केवल एक जनप्रतिनिधि को नहीं छीना, बल्कि छत्तीसगढ़ ने अपनी एक ममतामयी, संघर्षशील और संवेदनशील जननेत्री खो दी।

मिनीमाता जी का मूल नाम मीनाक्षी था। उनका जन्म 15 मार्च 1913 को असम के नौगाँव क्षेत्र में हुआ था। विवाह के बाद वे छत्तीसगढ़ आईं और यहीं सामाजिक सरोकारों तथा जनसेवा से उनका गहरा जुड़ाव बना। वर्ष 1952 में वे लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं और छत्तीसगढ़ क्षेत्र से संसद पहुँचने वाली पहली महिला सांसद के रूप में उन्होंने इतिहास रचा। इसके बाद भी उन्होंने लगातार जनता की आवाज संसद तक पहुँचाई।

उनका राजनीतिक जीवन केवल चुनाव जीतने और संसद में बैठने तक सीमित नहीं था। वे समाज के उन लोगों की आवाज बनीं, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करना पड़ा। अस्पृश्यता उन्मूलन, महिलाओं की शिक्षा, बाल विवाह, दहेज प्रथा और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने निरंतर आवाज उठाई। संसद में अस्पृश्यता निवारण से जुड़े कानून के लिए उनके योगदान को विशेष रूप से याद किया जाता है।

मिनीमाता जी का व्यक्तित्व राजनीति से कहीं बड़ा था। वे गरीबों, मजदूरों, महिलाओं और वंचित वर्गों के दुख-दर्द को समझती थीं। उनके दिल्ली स्थित निवास को जरूरतमंद लोगों के लिए आश्रय जैसा बताया जाता है। छत्तीसगढ़ से दिल्ली पहुँचने वाला कोई व्यक्ति यदि सहायता चाहता, तो मिनीमाता के द्वार उसके लिए खुले रहते थे। यही कारण था कि वे केवल ‘सांसद’ नहीं रहीं—वे जनता के बीच ‘ममतामयी मिनीमाता’ बन गईं।

छत्तीसगढ़ के विकास से जुड़े अनेक विषयों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। कृषि और सिंचाई के लिए हसदेव बाँगो परियोजना, भिलाई इस्पात संयंत्र में स्थानीय लोगों के रोजगार, मजदूर हितों तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रयासों को आज भी स्मरण किया जाता है। उनके नाम से जुड़ा मिनीमाता #बांगो_बाँध भी उनकी विकास-दृष्टि की स्मृति से जुड़ा हुआ है।

और फिर आया वह मनहूस दिन—11 अगस्त 1972।

मिनीमाता जी भोपाल से दिल्ली की यात्रा पर थीं। दिल्ली के #पालम हवाई अड्डे के निकट विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और ममतामयी जननेत्री सदा के लिए हमसे बिछुड़ गईं।

 संसद के तत्कालीन कार्यवाही अभिलेख में भी उनके निधन पर सदस्यों द्वारा गहरा शोक व्यक्त किया गया था। श्रद्धांजलि देते हुए उनके सामाजिक और राजनीतिक योगदान को याद किया गया तथा उनके निधन को देश और विशेषकर छत्तीसगढ़ के लिए बड़ी क्षति माना गया।

उनकी मृत्यु ने एक प्रश्न छोड़ दिया—क्या किसी व्यक्ति का जीवन उसके चले जाने के साथ समाप्त हो जाता है?

मिनीमाता का जीवन इसका उत्तर देता है—नहीं।

जो व्यक्ति समाज के लिए जीता है, वह अपनी मृत्यु के बाद भी अपने विचारों, संघर्षों और कार्यों में जीवित रहता है। मिनीमाता आज भी छत्तीसगढ़ की सामाजिक चेतना का हिस्सा हैं। महिलाओं के उत्थान और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उनके नाम पर मिनीमाता सम्मान स्थापित किया गया है।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस विचार को याद करना है कि संसद की शक्ति तभी सार्थक है, जब वह अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बने। यह उस संघर्ष को याद करना है, जिसमें जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, अशिक्षा, दहेज और महिलाओं के शोषण के विरुद्ध एक महिला ने अपने समय की रूढ़ियों को चुनौती दी।

मिनीमाता का विमान दुर्घटना में निधन हुआ था, लेकिन उनकी विचारधारा कभी दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुई।

उनकी आवाज आज भी सामाजिक न्याय की माँग में सुनाई देती है।

उनकी ममता आज भी छत्तीसगढ़ की जनचेतना में महसूस होती है।

उनका संघर्ष आज भी आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाता है।

पुण्यतिथि पर ममतामयी मिनीमाता जी को शत्-शत् नमन।



“देह चली गई, पर जनसेवा का वह दीप आज भी जल रहा है;

मिनीमाता केवल इतिहास नहीं, छत्तीसगढ़ की जीवित स्मृति हैं।”



11 अगस्त 1972 को मिनीमाता जी की मृत्यु भोपाल से दिल्ली जाते समय पालम हवाई अड्डे के निकट विमान दुर्घटना में हुई थी। लोकसभा के तत्कालीन अभिलेख में भी 11 अगस्त की विमान दुर्घटना और उनके निधन पर श्रद्धांजलि दर्ज है।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

गुरुदेव अरुण कुमार निगम को जन्मदिन की हार्दिक बधाई 🎂

 04 अगस्त 2026



 छ्न्द विधा के  पुरोधा आदरणीय छन्दविद् अरुण कुमार निगम गुरुदेव के श्रीचरणों में सादर प्रणाम।

छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा में छन्द-विधा के संरक्षण, संवर्धन और पुनर्स्थापन का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, आदरणीय अरुण कुमार निगम का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। जनकवि कोदूराम ‘दलित’ की समृद्ध साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए आपने उस समय छन्द-साधना का दीप प्रज्वलित किया, जब यह विधा धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही थी।

आपके अथक प्रयासों से "छन्द के छ" जैसे अभिनव अभियान ने असंख्य साहित्य साधकों को छन्दशास्त्र से जोड़ा। आपका छत्तीसगढ़ी छन्द-संग्रह "छन्द के छ" (2015) न केवल पचास प्रकार के छन्दों का संकलन है, बल्कि छन्द-रचना की विधि का एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक ग्रंथ भी है। आपके मार्गदर्शन में आज सैकड़ों कवि छत्तीसगढ़ी में शताधिक छन्दों की सशक्त रचना कर रहे हैं। यह आपकी साधना, समर्पण और साहित्य-सेवा का अनुपम परिणाम है।

आपका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, यश और निरंतर सृजन-शक्ति प्रदान करें, ताकि आपकी छन्द-साधना की यह अविरल धारा आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित करती रहे।

जन्मदिन की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ एवं हार्दिक बधाई, गुरुदेव!

आपका स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन हम सब पर सदैव बना रहे। 🌹🙏🎂



  संस्कृत के प्रथम आदि कवि वाल्मीकि से निस्सृत काव्य की धारा कालिदास से होते हुए हिन्दी के अनेक प्राचीन कवियों ने संवारा और छंदों की शक्ल में चन्दबरदायी,  कबीर, तुलसीदास, रहीम, गिरधर कविराय, सूरदास, पद्माकर, केशवदास, भिखारीदास आदि कवियों ने कालजयी साहित्य की रचना की।
छन्द शास्त्र के प्रणेता आचार्य पिंगल को माना गया है। इनका समय 200 ई.पू. माना जाता है। पिंगल मुनि के ग्रंथ का नाम ‘छन्दः सूत्रम्’ है, यह संस्कृत में है। यहाँ से प्रारंभ होकर 1883 ई. में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ कृत ‘छन्दः प्रभाकर’ आधुनिक हिन्दी के छन्द शास्त्र के व्याकरण की प्रथम पुस्तक है।
छत्तीसगढ़ के माटी के सपूत जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’, बाबू रेवाराम, खूबर दयाल, श्याम सुन्दर बाजपेयी ने आधुनिक हिन्दी काव्य साहित्य में हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, अनुप शर्मा के समानान्तर छन्दों की रचना की।





संस्कृत से हिन्दी और छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य में अंतःसलिला के रूप में प्रवाहित छन्द साहित्य पं. सुन्दरलाल शर्मा, महाकवि कपिलनाथ कश्यप, जनकवि कोदूराम ‘दलित’ से होते हुए आधुनिक छत्तीसगढ़ी कवि बुधराम, अरुण निगम तक पहुँची और वर्तमान में छन्दों में छत्तीसगढ़ी काव्य की रचना करने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिनमें श्रीमती शकुन्तला शर्मा, चौवाराम वर्मा ‘बादल’, रमेश कुमार सिंह चौहान, बसन्ती वर्मा, जितेन्द्र वर्मा ‘खैरझिटिया’, सूर्यकान्त गुप्त, दिलीप कुमार वर्मा, सुखदेव सिंह अहिलेश्वर, कन्हैया साहू ‘अमित’, बलराम चन्द्राकर, गजानंद पात्रे ‘सत्यबोध’ मिलन मलरिहा , हेमलाल साहू सहित दो सौ से ज्यादा कवि शामिल हैं, जो शताधिक छन्दों का प्रयोग छत्तीसगढ़ी काव्य लेखन में कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ी में विलुप्त हो रहे ‘छन्द विद्या’ को पुनर्स्थापित करने का महती कार्य जनकवि कोदूराम ‘दलित’ के सुपुत्र अरुण निगम द्वारा ‘छन्द के छ’ के माध्यम से किया जा रहा है। #अरुण_निगम_के छत्तीसगढ़ी छन्द संग्रह ‘छन्द के छ’ (2015) में पचास प्रकार के छन्दों की रचना व रचना-विधान एवं चौवाराम वर्मा ‘बादल’ के छत्तीसगढ़ी छन्द संग्रह ‘छन्द बिरवा’ (2018) में अड़तालीस प्रकार के छन्दों की रचना, रचना-विधान सहित प्रकाशित है। 
छत्तीसगढ़ी छन्द साहित्य के लिए छ्न्द के छ आनलाईन गुरुकुल एक वरदान सिद्ध हुआ।
✍️ मिलन मलरिहा 



गुरुदेव को जन्मदिन की पुनः बधाई, सादर प्रणाम 🙏 



मिलन मलरिहा 

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