04 अगस्त 2026
छ्न्द विधा के पुरोधा आदरणीय छन्दविद् अरुण कुमार निगम गुरुदेव के श्रीचरणों में सादर प्रणाम।
छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा में छन्द-विधा के संरक्षण, संवर्धन और पुनर्स्थापन का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, आदरणीय अरुण कुमार निगम का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। जनकवि कोदूराम ‘दलित’ की समृद्ध साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए आपने उस समय छन्द-साधना का दीप प्रज्वलित किया, जब यह विधा धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही थी।
आपके अथक प्रयासों से "छन्द के छ" जैसे अभिनव अभियान ने असंख्य साहित्य साधकों को छन्दशास्त्र से जोड़ा। आपका छत्तीसगढ़ी छन्द-संग्रह "छन्द के छ" (2015) न केवल पचास प्रकार के छन्दों का संकलन है, बल्कि छन्द-रचना की विधि का एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक ग्रंथ भी है। आपके मार्गदर्शन में आज सैकड़ों कवि छत्तीसगढ़ी में शताधिक छन्दों की सशक्त रचना कर रहे हैं। यह आपकी साधना, समर्पण और साहित्य-सेवा का अनुपम परिणाम है।
आपका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, यश और निरंतर सृजन-शक्ति प्रदान करें, ताकि आपकी छन्द-साधना की यह अविरल धारा आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित करती रहे।
जन्मदिन की कोटि-कोटि शुभकामनाएँ एवं हार्दिक बधाई, गुरुदेव!
आपका स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन हम सब पर सदैव बना रहे। 🌹🙏🎂
संस्कृत के प्रथम आदि कवि वाल्मीकि से निस्सृत काव्य की धारा कालिदास से होते हुए हिन्दी के अनेक प्राचीन कवियों ने संवारा और छंदों की शक्ल में चन्दबरदायी, कबीर, तुलसीदास, रहीम, गिरधर कविराय, सूरदास, पद्माकर, केशवदास, भिखारीदास आदि कवियों ने कालजयी साहित्य की रचना की।
छन्द शास्त्र के प्रणेता आचार्य पिंगल को माना गया है। इनका समय 200 ई.पू. माना जाता है। पिंगल मुनि के ग्रंथ का नाम ‘छन्दः सूत्रम्’ है, यह संस्कृत में है। यहाँ से प्रारंभ होकर 1883 ई. में जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’ कृत ‘छन्दः प्रभाकर’ आधुनिक हिन्दी के छन्द शास्त्र के व्याकरण की प्रथम पुस्तक है।
छत्तीसगढ़ के माटी के सपूत जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’, बाबू रेवाराम, खूबर दयाल, श्याम सुन्दर बाजपेयी ने आधुनिक हिन्दी काव्य साहित्य में हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, अनुप शर्मा के समानान्तर छन्दों की रचना की।
संस्कृत से हिन्दी और छत्तीसगढ़ी काव्य साहित्य में अंतःसलिला के रूप में प्रवाहित छन्द साहित्य पं. सुन्दरलाल शर्मा, महाकवि कपिलनाथ कश्यप, जनकवि कोदूराम ‘दलित’ से होते हुए आधुनिक छत्तीसगढ़ी कवि बुधराम, अरुण निगम तक पहुँची और वर्तमान में छन्दों में छत्तीसगढ़ी काव्य की रचना करने वालों की एक लंबी फेहरिस्त है, जिनमें श्रीमती शकुन्तला शर्मा, चौवाराम वर्मा ‘बादल’, रमेश कुमार सिंह चौहान, बसन्ती वर्मा, जितेन्द्र वर्मा ‘खैरझिटिया’, सूर्यकान्त गुप्त, दिलीप कुमार वर्मा, सुखदेव सिंह अहिलेश्वर, कन्हैया साहू ‘अमित’, बलराम चन्द्राकर, गजानंद पात्रे ‘सत्यबोध’ मिलन मलरिहा , हेमलाल साहू सहित दो सौ से ज्यादा कवि शामिल हैं, जो शताधिक छन्दों का प्रयोग छत्तीसगढ़ी काव्य लेखन में कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ी में विलुप्त हो रहे ‘छन्द विद्या’ को पुनर्स्थापित करने का महती कार्य जनकवि कोदूराम ‘दलित’ के सुपुत्र अरुण निगम द्वारा ‘छन्द के छ’ के माध्यम से किया जा रहा है। #अरुण_निगम_के छत्तीसगढ़ी छन्द संग्रह ‘छन्द के छ’ (2015) में पचास प्रकार के छन्दों की रचना व रचना-विधान एवं चौवाराम वर्मा ‘बादल’ के छत्तीसगढ़ी छन्द संग्रह ‘छन्द बिरवा’ (2018) में अड़तालीस प्रकार के छन्दों की रचना, रचना-विधान सहित प्रकाशित है।
छत्तीसगढ़ी छन्द साहित्य के लिए छ्न्द के छ आनलाईन गुरुकुल एक वरदान सिद्ध हुआ।
✍️ मिलन मलरिहा
गुरुदेव को जन्मदिन की पुनः बधाई, सादर प्रणाम 🙏
मिलन मलरिहा
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