मंगलवार, 17 मार्च 2015

बेटी


नोनी बाबू एक हे, झन कर संगी भेद ।
रूढ़ीवाद बिचार ला, लउहा तैंहा खेद ।।
 लउहा तैंहा खेद, नवा उजियारा आही।
 पढ़ही बेटी एक, दुई घर सिक्छा लाही ।।
 मान मिलन के गोठ, भ्रूणहत्या कर काबू ।
 भेद छोड़ के भेज, पढ़े बर नोनी बाबू।। ✨
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

 पुस्तक कापी लानदे, बिसादे अउ सिलेट !
 बरतन चउका झन करा, पढ़ाई ल झन मेट !!
 पढ़ाई ल झन मेट, ज्ञान मान अधिकार दे!
 बेटी बने पढ़ाव, चरित संसकार दे !!
 आही सिक्छा काम, दरद दुख देही दस्तक !
 मनुस छोड़थे संग, फेर नइछोड़य पुस्तक !!✨
 -
 बेटी पढ़के बाँटही, गांव गांव मा ज्ञान !
 परकेधन झन मान जी, इही देस के जान !!
 इही देस के जान, पढ़लिख जुग सिरजाही !
 रुकही अत्याचार, कुकर्मी दूर हटाही !!
 कहे मलरिहा रोज, लान दे बसता पेटी !
 अबतो जाग समाज, धरादे पुस्तक बेटी !!❄
 
 बहू कहाॅंले लानबो, परते  हवय  अकाल   ।
 बेटा बेटा सब गुनय,  इही  जगत  के हाल  ।।
 इही  जगत के हाल,  कोख भितरी मरवाथे  ।
 करले बने बिचार, दुवारी कोन सजाथे।।
 कहत मलरिहा गोठ , मती मा तोर बसाले  ।
 छोड़  दिही  संसार, लानबो बहू कहाँले  ।।❄
 -
नोनी ला झन मान तैं, ए जिनगी के बोझ।
टूरा दरुहा टेड़गा, कोनो कोनो सोझ ।।
कोनो कोनो सोझ, जेन सरवन बन पाथे।
दिनभर टेड़े आॅंख , फोन मा गेम चलाथे ।।
सरत रहै कइ काम, कान मा खोचे पोनी।
दाई बाबू के गोठ, मानथे बेटी नोनी।।

॥✍️ मिलन मलरिहा 
मल्हार बिलासपुर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें