रविवार, 13 फ़रवरी 2022

भारत रत्न लता मंगेशकर

कोकिल कंठी, भारत रत्न लता मंगेशकर जी ल

विनम्र श्रद्धांजलि:

“”””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””””

मध्यप्रदेश इंदौर रियासत के नाम जइसे ही मन मा आथे, सुध-बुध मा संगीत-साहित्य के संचार हो जाथे। ये रियासत हा बड़े बड़े साहित्यकार, अभिनेता, कवि, संगीतकार ला जनम दे हे। इही रियासत मं 28 सितंबर सन् 1929 मं प्रसिद्ध मराठी संगीतकार दीनानाथ मंगेशकर के घर पहली संतान के रूप मं लता मंगेशकर के जनम होइस। पिता, संगीतकार होय के कारण घर मं साहित्य, संगीत के कक्षा निरंतर चलत रहय इही कारण बचपन ले लता के संगे-संग आशा, मीना, उषा अउ हृदयनाथ मंगेशकर पांचों बहन-भाई ला संगीत कला विरासत मं मिलिस। लता जी बचपन ले ही गायिका बनना चाहत रहिस। निर्माता कुंदन लाल सहगल के फिल्म “चंडीदास” ले लता बहुत प्रभावित होइस।

एक दिन पिता के अनुपस्थिति मं संगीत कक्षा लता जी ल देखना पड़गे। सबों विद्यार्थी लता जी के स्वर-साधना मं झूमगे। पिता जी बेटी लता के संगीत स्वर ज्ञान देख अचंभित होगे। अउ कक्षा के दुआरी मं तब तक खड़े रहिस, जब तक संगीत पाठ समाप्त नइ होगे। दीनानाथ जी ला बेटी के भीतर सरस्वती पाके बड़ गर्व होइस।

फिल्म-कीर्ति मं लता जी पहली बार गायिका के रुप काम करिन।  पिताजी नइ चाहत रहिस कि लता फिल्म-संगीत के दुनिया मं कदम रखय। पिता के अनुरोध मं फिल्म ले लता के आवाज हटाए बर पड़िस।

1950-55 के दशक मं फिल्म दुनियां ल हर कोई पसंद नइ करत रहिन। फिल्म मं बेटी जात के  काम करना एक अच्छा घर खानदखान के पहचान नइ माने जाय।

फेर समय ल कोन जानथे, जेन जेकर बर बने रथे ओला बनाय बर समय खुद रद्द बना देथे। 1942 मं पिता के 41 वर्ष के उम्र मं असमय निधन के कारण घर के आर्थिक स्थिति खराब होंगे। चारों भाई बहन मन के पालन-पोषण की जिम्मेदारी के चिंता बड़े दीदी लता ऊपर आगे अइसन परिस्थिति मं बेटी लता,बेटा बनके घर के भार ला बोहलिस।

 परिवारिक जिम्मेदारी खातिर लता जी ला हिंदी और मराठी फिल्म मं काम करना पड़िस। अभिनेत्री के रूप मं उंकर प्रथम फिल्म मंगलागौर रहिन। 1952 मं फिल्म *बड़ी मां* मं लता जी नूरजहां के संग अभिनय करिन। स्वर के रानी ला भला फिल्म अभिनेत्री के रूप मं कइसे मया मिलय? ओला तो संगीत के सिन्हासन मं बईठना रहिस। 1942 मं लता जी के गायन शैली, मधुर कंठ सबके सामने आगे।

फिल्म *महल* के गीत- “आयेगा आनेवाला” सबके जुबान मं आगे। ये फिल्म लता के संगे संग अभिनेत्री मधुबाला घलो ला प्रसिद्ध बनादिस। एंकर बाद एक ले बढ़के एक हीट गीत मं लता जी के नाम लीखागे ।  लता जी कोरी भरके भाषा ले भी ज्यादा भाषा मं 40,000 ले भी ज्यादा गीत गा चूके हे। दुनिया मं सबले ज्यादा गीत गायन के गिनीज बुक रिकॉर्ड घलो उंकर नाम हे।

बछर 1958 ले 1962, 1965, 1969, 1993 अउ 1994 मं लगातार फिल्म फेयर पुरस्कार मिलिस।

 संगे-संग पद्म भूषण, दादा साहब फाल्के, राजीव गांधी पुरस्कार, महाराष्ट्र भूषण जिसे विशिष्ट पुरस्कार उंकर झोला मं हे।   आत्मा ही का नाम ले पुरस्कार की घोषणा अलग स्थान देते लता मंगेशकर फिल्म इंडस्ट्री के व्यक्तित्व भारत दादा साहब फाल्के पुरस्कार के विद्यालय के

लता मंगेशकर फिल्म इंडस्ट्री के पहली अइसन व्यक्तित्व आय जेन भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार ले विभूषित हे। लता जी छ: भारतीय विश्वविद्यालय के साथ न्यूयार्क विश्वविद्यालय ले डी.लिट. के मानद उपाधी ले विभूषित हे। लता जी के जित्ते-जियत उंकर नाम ले पुरस्कार के घोषणा उॅंनला विशिष्ट दर्जा वाले पहली पंक्ति मं खड़ा करथे। अइसन विभूति के जगह भविष्य पर कोई ले नइ सकय। 6 फरवरी 2022 के दिन भले उंकर शरीर पंचतत्व मं मिलगे फेर कलाकार कभू मरय नही वो सदा अमर रथे। अइसन व्यक्तित्व, स्वर के देवी ला मोर शत शत नमन।

✍️मिलन मलरिहा

मल्हार बिलासपुर छत्तीसगढ़


गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

छत्‍तीसगढ़ी के यशस्‍वी कवि दानेश्वर शर्मा

छत्‍तीसगढ़ी के यशस्‍वी कवि दानेश्वर शर्मा

""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""""

हिन्‍दी अउ छत्‍तीसगढ़ी के यशस्‍वी कवि दानेश्वर शर्मा जी के जन्म 10 मई 1931 ग्राम मेडेसरा, जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़) (म.प्र.) मं होइस । पिता के नाम पं. गंगा प्रसाद द्विवेदी अउ माता श्रीमती इन्दिरा द्विवेदी।  दानेश्‍वर शर्मा,बी.ए. एल.एल.बी. वकालत के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र 

के संपादकीय विकास विभाग मं प्रबंधक के पद मा अपन सेवा दिस। हिन्‍दी, छत्‍तीसगढी ,अंगेजी अउ संस्‍कृत भाषा मं  सतत मौलिक लेखनी अउ मिलनसार व्यक्तित्व हा ओला अखिल भारतीय स्तर के साहित्यकार के रुप मं स्थापित करिस। 

 शर्मा जी के साहित्य लेखन 1955 मं आरंभ होइस। उंकर पहली रचना #बेटी_के_बिदा 1966 ई. मं सबके सामने आइस।  लोककला ला मूल स्वरुप मं सकेले के उदिम वाले विचारधारा ही ओला चंदैनी गोंदा के सर्जक #दाऊ_रामचन्द्र_देशमुख अउ डाॅ. खूबचंद बघेल के समविचारिक बनाथे। बघेरा के काव्य गोष्ठी मं दाऊ जी संग एतिहासिक छायाचित्र (डाॅ. सुरेश देशमुख के किताब - चंदैनी गोंदा) मन एंकर पुष्टि करथे। 

दानेश्वर शर्मा जी के रचना के प्रकाशन अखण्‍ड ज्‍योति, 

नागपुर टाइम्‍स (अंग्रेजी दैनिक) साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान, ब्लिट्ज, धर्मयुग, स्‍थानीय पत्र-पत्रिका मनके संगे संग प्रसारण दूरदर्शन, आकाशवाणी केन्द नागपुर, रायपुर, भोपाल, इंदौर, रीवां, छतरपुर,  इलाहाबाद के  केन्‍द्र ले सरलग होवत रहिस।

 दैनिक भास्‍कर अउ नव-भारत दैनिक मं तीन साल ले  लोक दर्शन नाम ले उॅंकर ललित निबन्‍ध स्तंभ लेखन बड़ लोक प्रचलित होइस।


प्रकाशित पुस्‍तक--

""""""""”"""""""""""""""

 #छत्‍तीसगढ_के_लोक_गीत (विवेचना  सन् 1962), 

#हर_मौसम_में_छन्‍द_लिखूंगा (हिन्‍दी गीत संग्रह सन् 1993), 

#लव_कुश -(खण्‍ड काव्‍य सन् 2001), 

#लोक_दर्शन (अनेक धर्म दर्शन व परब-तिहार बर निबंध संग्रह, सन् 2003) 

#तपत_करू_भई_तपत_कुरू ( छत्‍तीसगढ़ी कविता संग्रह --2006) 

#गीत_अगीत  (हिन्‍दी काव्‍य संग्रह -सन्  2007)


रविशंकर विश्‍वविद्यालय के एम.ए. (हिन्‍दी) के लोक साहित्‍य विषय  निर्धारित छत्‍तीसगढी काव्‍य संकलन वर्तमान मं निर्धारित छत्‍तीसगढी भाषा अउ साहित्‍य किताब मन मं घलो शर्मा जी के कवितामन संग्रहित हावय।


शर्मा जी के लेखन आभा छत्तीसगढ़ भारत मं तो हवय ही संगे संग देश ले बाहिर भी छाप छोड़े हे। जइसे शिकागो विश्‍वविद्यालय ले प्रका‍शित रिवोलुशनिज्‍म इन छत्‍तीसगढ़ी पोएट्री मं घलो मिलथे। शर्मा विश्‍व प्रसिद्ध संस्‍था फोर्ड फाउन्‍डेशन ले प्रकाशित 11 पुस्‍तक के संपादक सलाहकार घलो रह चूके हे।

छत्‍तीसगढ मं ग्रामोफोन रिकाडर्स के कैसेट के ओ समय भारी चर्चा रहिस जेमा शर्मा जी के सर्वाधिक गीत के रिकार्डिंग होय रहिस जेला स्वर देके बैतलराम साहू छत्तीसगढ़िया किशोर कुमार के नाम ले मशहूर होइस। 

 ओ बेरा देश के सबले प्रसिद्ध कंपनी  हिज मास्‍टर्स वायस (कलकत्‍ता)।  म्‍यूजिक इंडिया- पोलीडोर (मुंबई),  सरगम- रिकार्डस -(बनारस) अउ वीनस कैसेट्स (मुंबई) मं छत्तीसगढ़िया रंग चढ़िस।

छत्तीसगढ़ी फीचर फिल्‍म मोर धरती मईया मं  इंकर गीत आपमन जरुर सुने होहा।


भिलाई इस्‍पात संयंत्र मं प्रतिवर्ष आयोजित #छत्‍तीसगढ़_लोक_कला _महोत्‍सव हा शर्मा जी के देश आय। इही मंच ले पंथी नर्तक देवदास, पंडवानी गायिका पदमभूषण तीजन बाई, रितु वर्मा जइसे अनेक कलाकार मनला देश-प्रदेश पहुचाॅंइस अउ राष्‍ट्रीय सम्‍मान इंकर झोला मं लाके रखिस। 

श्री दानेश्‍वर शर्मा जी श्रीमदभागवत महापुराण के श्रेष्ठ कथावाचक के रुप मं घलो देश में प्रसिद्ध रहिस, ओला

 सन् 2006 मं  राष्‍ट्रपति के द्वारा साहित्‍य सम्‍मान प्राप्‍त होइस अउ सन् 2007 मं अमेरिका के न्‍यूयार्क शहर मं आयोजित आठवईयां विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन मं छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधित्व करें के अवशर मिलिस।


शर्मा जी के प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी गीत--

१ दाई ओ ददा गो लइका बर फुग्गा ले दे...

२ मोर सारी परम पियारी....

३ लाखों मं एकझन हावै गा मोर समधिन..

४ तपतकुरु भइ तपतकुरु बोल रे मिट्ठू ...

श्री दानेश्वर शर्मा जी के साहित्यिक गुरु जनकवि कोदूराम दलित जी रहिन।

1955 ले साहित्य के सतत सेवा करत, छत्तीसगढ़ राजभाषा के पदेन अध्यक्ष (द्वितीय) के रुप मं छत्तीसगढ़ी के सेवा करके आज रतिहा दिनांक 03-02-2022 श्री दानेश्वर शर्मा जी छत्तीसगढ़ साहित्य संसार ले विदा होगे।

___________________________________________

आलेख -

✍️मिलन मलरिहा

04/02/2022

 

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

narendra dev verma...., नरेंद्र देव वर्मा......अरपा पैरी के धार, छत्तीसगढ़ के राजगीत के रचनाकार......लेख.कवि सुशील भोले संजय नगर, रायपुर मो/व्हा. 9826992811----

छत्तीसगढ़ म सोनहा बिहान के सपना देखइया डा. नरेन्द्रदेव वर्मा... अरपा पैरी के धार महानदी हे अपार, इंद्रावती ह पखारय तोर पइंया. महूं पांव परंव तोर भुइंया, जय हो जय हो छत्तीसगढ़ मइया.. छत्तीसगढ़ राज के ये राजगीत ह आज जन-जन के कंठ म बिराजे वतके मान-सम्मान अउ मया पाथे, जतका ए देश के राष्ट्रगान ह देश म पाथे. आज राजगीत ल हमन जेन धुन अउ ताल म सुनथन ए ह दू-तीन पइत के मंजाय म आज के रूप म हमर आगू म आय हे. ए गीत के सिरजनकार डा. नरेंद्रदेव वर्मा जी जब एला लिखिन, त खुदे गावंय घलो. उंकर संग म संगत करे साहित्यकार मन बताथें, डाक्टर साहब अब्बड़ सुग्घर एला गावंय. बाद म जब "सोनहा बिहान" सांस्कृतिक संस्था संग जुड़िन त उहाँ वो बखत केदार यादव गायक कलाकार रहिन. उनला उन गा के बताइन के मैं एला अइसे गाथंव कहिके. एक कवि के कंठ ले एक सीखे-पढ़े गायक के कंठ म जाथे, त कोनो भी गीत ह वोकर गायकी शैली म सुनाए लगथे. केदार यादव एला अपन शैली म सोनहा बिहान के मंच गाये लागिस. बाद म फेर ए गीत ह शास्त्रीय संगीत के जानकार गोपाल दास वैष्णव जी के कंठ म गइस त एमा अउ परिमार्जन होइस. ए रूप ह सोनहा बिहान के सर्जक दाऊ महासिंग चंद्राकर जी ल गजब पसंद आइस, त फेर वोमन एला केदार यादव के बदला ममता चंद्राकर जगा सोनहा बिहान के मंच म गवाए लागिन, फेर बाद म ममता के ही आवाज म रिकार्डिंग घलो होइस, जेन ह आज हम सब के कंठ म बिराजे हे. ए राजगीत के रचना ह इहाँ के सांस्कृतिक जागरण के प्रथम मंच कहे जाने वाला "चंदैनी गोंदा" के प्रथम मंचन के बाद म होइस. एकर संबंध म चंदैनी गोंदा के प्रथम उद्घोषक रहे प्रो. सुरेश देशमुख जी बताथें, अरे पहिली ए महत्वपूर्ण गीत ल लिखे गे रहितीस त दाऊ रामचंद्र देशमुख जी थोरहे एला छोड़तीस. फेर ए ह तो महासिंग दाऊ के भाग म रिहिसे, तेकर सेती बाद म लिखाइस. डा. नरेंद्रदेव वर्मा जी के गायकी के संबंध म दाऊ महासिंग चंद्राकर जी घलो बतावंय. जब मैं छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका "मयारु माटी" के प्रकाशन संपादन करत रेहेंव त बघेरा दुरुग जवई घलो होवय. बघेरा म दाऊ रामचंद्र देशमुख जी संग मिल-भेंट के आवंव त लहुटती म दुरुग म दाऊ महासिंग चंद्राकर जी जगा घलो एकाद घंटा बइठे करंव. जब भी उंकर संग बइठंव त डा. नरेंद्रदेव वर्मा जी के चर्चा जरूर होवय. वोमन बतावंव वर्मा जी खुदे हारमोनियम बजाके ए गीत ल गावंय. वोमन वर्मा जी ल "नरेंद्र गुरुजी" काहंय. जब उंकर चर्चा करंय तहांले उंकर दूनों आंखी ले गंगा- जमुना बोहाए लागय. उन कहंय-" नरेंद्र तो मोर गुरु, सलाहकार मोर बोली भाखा अउ सब कुछ रिहिसे. वो जब ले गेहे तब ले मैं कोंदा- लेड़गा होगे हंव. न बने ढंग के कुछू बोल सकंव न बता सकंव. डॉ. नरेंद्रदेव वर्मा जी के जनम माता भाग्यवती देवी अउ पिता धनीराम वर्मा जी के इहाँ 4 नवंबर 1939 म होए रिहिसे. वो बखत धनीराम जी उच्च शिक्षा के प्रशिक्षण खातिर वर्धा म रिहिन हें. डॉ. नरेंद्रदेव वर्मा के चिन्हारी एक कवि, नाटककार, उपन्यासकार, समीक्षक अउ भाषाविद के रूप म तो हावय च, उन मंच के जबर उद्घोषक घलोक रिहिन हें. वोमन सागर विश्वविद्यालय ले सन् 1962 म एम.ए. के परीक्षा पास करे रिहिन हें, अउ उहेंच ले 1966 म "प्रयोगवादी काव्य और साहित्य चिंतन" विषय म पीएचडी के उपाधि पाए रिहिन हें. सन् 1973 म उन भाषा विज्ञान म फेर एम.ए. करीन, अउ फेर 1973 म ही "छत्तीसगढ़ी भाषा का उदविकास " शोधप्रबंध म फेर पीएचडी पाइन. पांच भाई अउ एक बहिनी ले भरे-पूरे परिवार म नरेन्द्रदेव जी तीसरा नंबर के भाई रिहिन. उंकर सबले बड़े भाई तुलेन्द्र ल हम सब स्वामी आत्मानंद जी के नांव ले जानथन, उंकर दूसरा नंबर के भाई देवेन्द्र जी ल हम स्वामी निखिलात्मानंद जी के नांव ले जानथन, जेन नारायणपुर आश्रम के सचिव के रूप म घनघोर आदिवासी इलाका म ज्ञान अउ सेवा के जोत जलाइन. चौथा नंबर के भाई जेला राजेन्द्र/राजा भैया के नांव ले जानथन उहू म सन्यास के जीवन ल आत्मसात कर ले रिहिन, सबले छोटे भाई डा. ओमप्रकाश वर्मा जी इहाँ के रविशंकर विश्वविद्यालय म मनोविज्ञान के प्रोफेसर के संगे-संग विवेकानंद विद्यापीठ के सचिव घलो हें. इन पांचों भाई के दुलौरिन बहिनी लक्ष्मी दीदी जी हें. इन पांचों भाई म के चार भाई मन संग तो मोर भेंट अउ गोठबात होए हे, फेर जेन हमर भाखा- साहित्य के रद्दा ल चुने रिहिन वो डा. नरेन्द्रदेव जी के मोला कभू दर्शन नइ हो पाइस. जब मैं साहित्य जगत म आएंव, तब तक उन ए दुनिया ले प्रस्थान कर डारे रिहिन हें. मैं उनला सिरिफ उंकर साहित्य के माध्यम ले ही मिल पाएंव. जब मैं कालेज म गेंव त उहां हिन्दी विषय के अंतर्गत उंकर उपन्यास "सुबह की तलाश" पढ़ेंव. इही उंकर साहित्य संग मोर पहिली भेंट रिहिसे. बाद म उंकर मंझला सुपुत्र अन्नदेव वर्मा संग चिन्हारी होए के बाद अउ साहित्य मन संग भेंट होइस. उंकर एक नाटक "मोला गुरु बनइले" आकाशवाणी म बड़ लोकप्रिय होए रिहिसे, वोला कई पइत सुने ले मिलिस. डॉ. नरेंद्र देव वर्मा जी के मन म छत्तीसगढ़ के पीरा अउ शोषण के गुबार तो भरे रिहिसे जेन ह उंकर उपन्यास 'सुबह की तलाश' म घलो दिखय. वोमन जब 'सोनहा बिहान' के संचालन करंय तभो उंकर बोली ले ये सब बात ह दमदारी के साथ सुनावय. भले उंकर भौतिक जीवन ह कमेच बछर के रिहिसे, फेर वो ह छत्तीसगढ़ खातिर एक "जागरण पुरुष" के जीवन रिहिसे. उंकर अग्रज स्वामी आत्मानंद जी अपन संस्मरण म उंकर बारे म लिखे हें- "नरेन्द्र देव वर्मा रचित 'सोनहा बिहान' की मैंने बहुत प्रशंसा सुनी थी. एक दिन मैंने नरेंद्र से कहा, अरे जरा एक बार अपना वह 'सोनहा बिहान' सुनवाओ. 1978 के अंत में एक दिन उसने सूचना दी कि महासमुंद में 'सोनहा बिहान' का प्रदर्शन है और मैं चाहूँ तो वहाँ जाकर देख सकता हूँ. हम कुछ लोग रायपुर से गए. महासमुंद पहुंचने में कुछ देर हो गई. सर्वसाधारण के साथ ही उसने मेरी भी बैठने की व्यवस्था की. किसी ने उससे कहा कि अरे स्वामी जी को यहाँ बिठा रहे हो? सबके साथ? वहाँ अलग से एक कुर्सी क्यों नहीं दे देते? नरेंद्र का उत्तर तो मैं नहीं सुन पाया, पर मुझे सबके साथ ही जमीन पर बैठना पड़ा. बाद में पता चला कि नरेंद्र नहीं चाहता था कि मेरे कारण दूसरों को किसी प्रकार की असुविधा हो अथवा कार्यक्रम में किसी प्रकार से कोई विघ्न उत्पन्न हो. उसकी भावना ने मुझे भावविभोर कर दिया और मेरी आत्मा पुकार उठी- 'नरेंद्र, सचमुच तुम मेरे अनुज हो." मैंने 'सोनहा बिहान' देखा और सुना. नरेंद्र कार्यक्रम का संचालन कर रहा था. सब कुछ अपूर्व था. उसकी तेजस्विता और स्वाभिमान के उस दिन मुझे दर्शन हुए. वह दबंग था, अन्याय के समक्ष वह झुकना नहीं जानता था, पर वह अविनयी नहीं था. अपनी जनमभूमि छत्तीसगढ़ के प्रति उसका आहत अभिमान उसके संचालन में मानो फूट-फूट पड़ रहा था, पर मुझे लगा कि जनसभा में एक शासकीय कर्मचारी को इतना स्पष्ट होकर अपने विचार को अभिव्यक्ति देना ठीक नहीं है. 'सोनहा बिहान' में छत्तीसगढ़ के शोषण का वर्णन है. शोषण के विरुद्ध माटी की तड़प नरेंद्र के स्वर में अभिव्यंजित हुई थी." छत्तीसगढ़ महतारी के ये सच्चा सपूत बहुते कम दिन ए माटी के जागरण अउ सेवा म रह पाइन अउ 8 सितम्बर 1979 के परमधाम के रद्दा धर लेइन. उंकर सुरता ल डंडासरन पैलगी करत उंकरेच ए अठवारी बजार के ये चार डांड़- दुनिया हर रेती के महाल रे, ओदर जाही दुनिया अठवारी बजार रे, उसल जाही.. आनी बानी के हावय खेलवना, खेलव जम्मो खेल रकम रकम के बिंदिया फुंदरा, नून बिसा लव तेल दुनिया हर धुंगिया के पहार रे, उझर जाही दुनिया अठवारी बजार रे, उसल जाही.. -सुशील भोले संजय नगर, रायपुर मो/व्हा. 9826992811

रविवार, 25 अप्रैल 2021

coluor drwaving मिलन मलरिहा

 

Milan malariha art

गुड़ वाली चाय

    “नान, आज चाय पीने नहीं आई ? आओ दौड़कर। नहीं तो चाय ठण्डी हो जाएगी।” 
    यह स्नेहिल आवाज़ थी मनमतिया फुआ की। वह चाय के लिए जो मुझे हर दिन बुलाती थी। आज भी बड़े स्नेह से बुला रही थी। प्रत्युत्तर में मैंने भी उसे शीघ्र पहुँचने का संकेत दे दिया था। 
    जब मैं दस वर्ष की थी तब से मुझे मनमतिया फुआ की गुड़ वाली चाय बहुत भाती थी। अहहहह ! यार क्या बोलूँ ! उसकी संजीवनी औषधि के माफिक झाल-मीठी ख़ुशबूदार देशी गुड़ की चाय की दीवानी जो मैं बन चुकी थी। फुआ की चाय के नाम से एकबारगी मेरे मुँह से लार भी तो टपक पड़ती थी। उसे चुस्की लेते बड़े मजे से पीती थी मैं।
    मुझे ही क्या गाँव में न जाने कितने लोगों को शाम को मनमतिया फुआ की चाय पीने की आदत थी। राधा जो कि एक आँख से अंधी थी। सरजू की माँ जिसके घर में कभी चाय नहीं बनती थी। बगल की गौरी और मेरी भी दिनचर्या में शामिल थी फुआ की चाय।
    फुआ का घर मिट्टी का था। ऊपर में छप्पर और एक छोटा सा आँगन, जहाँ बाल्टी में पानी। वहीं पर दो चार काई लगी ईंटें। सामने में ओटा था जिस पर लोग बैठते थे। खाना खाने के लिए काँसे की दो थालियों के साथ स्टेनलेस स्टील के गिलास और चार कप-कटोरी। इतनी ही चीज़ें मुझे दिखती थीं फुआ के घर में। आर्थिक उपार्जन के नाम पर दो बीघा ज़मीन थी, जिसे अधिया में फ़सल लगाने को किसी को दे देती थी। वह किसान भी फुआ को अनाज देने में मनमानी करता था। बस कुछ दे जाता था।
    माँ बताती मनमतिया फुआ दीनबंधु की पहली पत्नी थी। फुआ के कोई बाल- बच्चे नहीं हुए। जिसके कारण दीनबंधु ने दूसरी शादी कर ली। शहर में जाकर बस गए। तब से फुआ की यही एकाकी ज़िन्दगी थी, जिसे वह हर शाम भरा-पूरा करती थी।
    शाम होते ही फुआ के दरवाजे के ओटा पर बहुत लोग आ बैठते थे। जैसे किसी स्वादिष्ट सामान विक्रेता ठेले वाले के पास शाम होते ही भीड़ हो जाती है। ठीक उसी तरह फुआ के पास भी। लेकिन दोनों में अंतर था। ठेला वाला पैसा लेता था और फुआ  बैठकर चाय पीने वालों से बदले में कुछ भी नहीं लेती थी।       
    शाम होते ही फुआ की गुड़, तुलसी, अदरक वाली सुगंधित चाय बनती थी, जिसे बैठने वाले सभी पीते थे। मैं कभी खेल में व्यस्त होती तो फुआ जोर से आवाज देती थी "नान, आज चाय पीने नहीं आई ?" और मैं दौड़कर चली जाती थी स्वादिष्ट चाय पीने। बदले में फुआ छोटा-मोटा काज भी नहीं कराती थी। यहाँ तक कि गर्म चाय को कटोरी में डालकर देती थी मुझे पीने के लिए। और कटोरी भी नहीं धुलवाती थी फुआ। रोज चाय की व्यवस्था के लिए तुलसी के पौधे से तुलसी के पत्ते और अदरक के पौधे से अदरक फुआ को अपनी बाड़ी से मिल जाते थे। गुड़ का खर्च उठाने में और गैरों को चाय पिलाने में फुआ के चेहरे में कोई शिकन नहीं होती थी ।
    फुआ का हमारे परिवार से न जाने कैसा मेल था। जबकि वह मेरे पापा की सगी बहन भी नहीं थी। फिर भी हम सबको ऐसा लगता था कि अगर हमारे परिवार में विपत्ति आएगी तो सबसे पहले फुआ ही दौड़ी आएगी। ऐसी आत्मीयतापूर्ण व्यवहार ने मुझे बाँध लिया था। एक ऐसा रिश्ता बन गया था जो कभी टूट नहीं सकता था। इतना विश्वास भी कायम हो गया था जो कभी शक में बदल नहीं सकता था। 
    एक घटना मुझे याद है। गाँव में काक मैथुन कोई देख ले तो बहुत अशुभ माना जाता था और उस अशुभ की काट करने के लिए झूठ-मूठ की ख़बर देनी होती थी। हाँ झूठ-मूठ की ख़बर कि जो देखा है उसकी मृत्यु हो गई। इस झूठी ख़बर को सुनकर कोई सच्चा आँसू बहा दे तो दोष कट जाता है ऐसी मान्यता गाँव में प्रचलित थी। एक बार मेरी दीदी ललिता ने काक मैथुन देख लिया था। मेरी माँ भयभीत और चिन्तित थी कि दोष को कैसे काटा जाय ? तब यह निर्णय लिया गया कि मनमतिया फुआ को यह झूठी ख़बर दे दी जाय कि ललिता की मृत्यु हो गई है। जैसे ही यह ख़बर फुआ ने सुनी। दहाड़े मार-मार कर रोई। सच्चा आँसू बहा दिया। लगता था कि दीदी ललिता अपनी खुद की सचमुच की बेटी हो। हालांकि योजना के मुताबिक काक मैथुन दोष कट गया। पर फुआ का एकाएक भावुक हो जाना, बहुत समय तक शोकमग्न रहना, हम लोगों के परिवार के प्रति उसके बहुत गहरे अपनापन और समर्पण को प्रमाणित करता था।
    ऐसे ही एक दफा घर में अचानक माँ के कराहने की आवाज़ उसके जोड़-जोड़ से आ रही थी। मैं दौड़कर गई। मैंने माँ से पूछा क्या हुआ ? माँ के पेट में इतना तेज दर्द था कि मैं उसके लिए क्या लाऊँ या किसे बुलाऊँ इतना भी वह मुँह से नहीं कह पा रही थी। उन दिनों का मेरा बालमन बहुत भयभीत था। मुझे लग रहा था यह दर्द कुछ देर और रहा तो मेरी माँ के तन से प्राण पखेरू उड़ जाएंगे। मैं दौड़कर मनमतिया फुआ को बुलाकर ले आई। फुआ ने रसोईघर से एक काँसा का लोटा लिया। गोबर का एक दीया बनाया। तेल-बाती से एक दीप जला दिया और नाभि में उसी  दीये को रखकर लोटा को पेट पर उल्टा खपा दिया। जब तक दर्द रहा लोटा पेट से चिपका रहा। जैसे ही दर्द खत्म हुआ लोटा स्वतः ही पेट से निकल गया। मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि इतना तेज दर्द लोटा चिपकाने मात्र से कैसे खत्म हो गया ! मैं फुआ से बोली, "वाह यह तो कमाल है फुआ, आपके हाथों में तो जादुई हुनर है। आप तो डॉक्टर हो।" उत्तर में फुआ ने मुस्कुरा दिया और मेरा माथा चूम लिया।
    फुआ का पतला छरहरा बदन उस पर गुलाबी साड़ी खूब सुन्दर जँच रही थी। "ओ फुआ, आज सुबह-सुबह कहाँ जाने के लिए तैयार हो ?" मैंने हँसते हुए पूछा।
    "अरी, कल तिल संक्रांत है। तो आज तुम्हारी माँ ने तिल के लड्डू बनाने के लिए मुझे बुलाया है।" फुआ भी हँसते हुए बोली। लड्डू बनाने में कितने तार का पाग रहेगा, बड़ी तिलौरी में उड़द की पीठी में कितना फेंट होगा,  सब फुआ को पता था। जब कभी लडडू या बड़ी तिलौरी बनाना हो फुआ छह बजे स्नान कर घर आ जाती थी। बनाते-बनाते बारह बज जाते थे। फिर तो दोपहर का भोजन फुआ हम लोगों के घर से खाकर ही जाती थी।
    आज फुआ के ओटा में कुछ अधिक ही भीड़ थी। कल कार्तिक पूर्णिमा के दिन नदी स्नान की तैयारी हो रही थी। फुआ की आदत तो थी ही अच्छी। भोर के समय ठीक घड़ी में चार बजा। फुआ उठी। फटाफट सबके घर का साँकल बजा बजाकर सबको उठाया। फिर सबको एकत्रित कर नदी  स्नान के लिए ले चली। मुझे एक भी वह व्यक्ति याद नहीं जिससे फुआ की नहीं बनती हो। अर्थात मनमतिया फुआ बहुत भली थी। सबके लिये अच्छा सोचती थी और अच्छा करती थी। उसे मैं समाज की एक जागरूक और समदर्शी महिला कहूँ तो गलत नहीं कहूंगी। बेशक उसकी चेतना जागी हुई थी। सबको समान दृष्टि से देखती थी। उसमें निश्छलता का गुण और सेवा का भाव था।
    एक बार गाँव की सारी फ़सलें मुरझाने लगीं। बारिश नहीं हो रही थी। सभी किसान चिन्तित थे। मैं भी अपनी माँ के साथ अपने खेतों की फ़सल को मुरझाते देख चिन्तित थी। फुआ ने तरकीब निकाली। एक मेंढक और एक मेंढकी लिया। दो टोले वालों में से एक को मेंढक और दूसरे को मेंढकी दे दी। खूब आनंद से मेंढक-मेंढकी का ब्याह रचाया। हम सब बच्चों ने भी गुड्डे-गुड़ियों का खेल बंद किया। इस ब्याह उत्सव में शामिल हुए। साथ ही साथ ऊपर आसमान को देखते। इतना साफ आसमान, इतनी तेज धूप क्या सचमुच में बारिश होगी ? लेकिन ब्याह खत्म होते-होते न जाने कहाँ से काले-काले बादल घुमड़ पड़े और खूब झमाझम बारिश हुई।
    एक दिन फुआ के घर के सामने घोड़ा बँधा था। मुझे बड़ी उत्सुकता हुई। दौड़कर अंदर गई देखा एक पुरुष फुआ से ऊँची आवाज़ में झगड़ने जैसी बातें कर रहा था। वह बार-बार कहता था कि सोने का बाजूबंद कहाँ है ? बाजूबंद मेरे पास नहीं है यह बात फुआ बार बार दुहरा रही थी। अब तो वह पुरुष फुआ पर हाथ उठाने लगा। रुदन की आवाज़ आने लगी। मैं दौड़कर गई। अपनी माँ को बुला लाई। दोनों का झगड़ा शान्त करवाया। वह पुरुष कौन है मेरे पूछने पर मेरी माँ ने ही बताया कि वही दीनबंधु  हैं। यानी फुआ के पति।
    इधर फुआ बीमार रहने लगी थी। उधर बेचारी गरीब राधा के बेटे को गंभीर बीमारी लग गई थी। इलाज के लिए पैसे नहीं थे। बहुत दिनों तक राधा नहीं दिखी। पता चला कि उसके बेटे की अंतिम स्थिति है। पैसे के अभाव में आखिरी साँसें गिन रहा है। मेरा बालमन दु:ख देखकर भाव विह्वल हो रहा था। इधर दीनबंधु का आना-जाना बढ़ गया। साथ ही लड़ाई-झगड़े भी बढ़ गए। लड़ाई की जड़ सोने का बाजूबंद था। बेचारी फुआ आए दिन पति की मार खाती थी।
    आज दिनबंधु की आँखें लाल थीं। इतनी डरावनी आँखें जैसे वे इंसान नहीं शैतान हों। मुझे बहुत डर लग रहा था। फुआ की चीख सुनाई दे रही थी। मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि फुआ को मैं बचाऊँ। आँखों से बेबसी के अविरल अश्रु बह रहे थे। मैंने हिम्मत बटोरी। दौड़कर एक पत्थर उठा लाई। दीनबंधु को मारना चाहा। पर पत्थर मेरे ही पैर पर गिरकर उसने मुझे और रुलाया। शाम को पूरे गाँव में ख़बर फैली कि फुआ अब नहीं रही। 
    मैं इस घटना से हतप्रभ थी। मेरे जिस्म में काटो तो खून नहीं। फुआ के प्राण जाने के पीछे वही दीनबंधु थे। आह, उन्होंने यह घोर अन्याय क्यों कर दिया। इतनी निर्दयता तो कोई लाख दुश्मन पर भी नहीं दिखलाये। अपनी पहली पत्नी पर सद्भावना नहीं रखते थे तभी फुआ पत्नी प्रताड़ना की भेंट चढ़ गई।
    वह पत्थरदिल क्या पिघलता। उसे क्या फ़र्क पड़ता। फ़र्क को गाँव के फुआ के परम हितैषियों को पड़ा था। सारे नजदीकी मुहल्ले वाले दु:ख की घड़ी में इकट्ठे हो गए थे। सरजू की माँ गौरी, मीरा और दूसरी महिलाएँ सभी रो रही थीं साथ में मैं भी। सफेद कपड़ों में आँखें मूँदे फुआ अंतिम यात्रा के लिए सजी थी। तभी राधा ने बिलखते हुए फुआ के पैर पकड़ लिये। विलाप करने लगी, “मेरे बेटे की जान बचाने वाली ऐ फुआ तू कहाँ चली गई। अपना सोने का बाजूबंद मुझे दे दिया। मैं कैसे तेरा कर्ज उतारूँ … !!" 
    बहरहाल यह अनहोनी वाली होनी थी। सबको ज्ञात था कि फुआ के हृदय में बच्चों के प्रति ममता का सागर उमड़ता था और बड़ों के प्रति सद्भाव की हिलोरें। उसकी गुड़ वाली चाय को मैं क्या कोई भी कभी भूल नहीं सकेगा। जब-जब शाम आएगी याद आएगी। मैं तो मानती हूँ मनमतिया फुआ में महान् त्याग की भावना थी। दुनिया सदैव उसकी अच्छाइयों का गान करेगी। अपने सद्चरित्र और संस्कार में अमर रहेगी वह।