शनिवार, 15 अगस्त 2026

मीनी माता (मिनाक्षी)

 ((गुरु घासीदास की बहू  (पुत्रवधू) थी मीनी माता)) 

1952, 1957, 1962, 1967 और 1971  में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर सांसद चुनी गईं।





मिनीमाता का जन्म 1913 में असम के नौगांव में हुआ था। उनकी मूल नाम मीनाक्षी देवी था। छत्तीसगढ में 1901 से 1910 के बीच पड़े भीषण अकाल के दौरान उनके परिवार के लोगों को असम के चाय बगान में मजदूरी के लिए जाना पड़ा था। रेलगाड़ी से असम जाते समय उनकी दो बहनें ट्रेन में ही चल बसीं थीं। उनका बचपन काफी गरीबी में गुजरा। उनका विवाह छत्तीसगढ़ के सतनामी पंथ के महान संत गुरुघासी दास से पुत्र गुरु अगम दास के संग हुआ था।

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11 अगस्त 1972 का दिन छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक ऐसी पीड़ा लेकर आया, जिसे आज भी भुलाया नहीं जा सकता। इसी दिन छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला सांसद, समाज सुधारक और वंचितों की सशक्त आवाज मिनीमाता जी का एक विमान दुर्घटना में असामयिक निधन हो गया। भोपाल से दिल्ली जाते हुए पालम हवाई अड्डे के निकट हुई इस दुर्घटना ने केवल एक जनप्रतिनिधि को नहीं छीना, बल्कि छत्तीसगढ़ ने अपनी एक ममतामयी, संघर्षशील और संवेदनशील जननेत्री खो दी।

मिनीमाता जी का मूल नाम मीनाक्षी था। उनका जन्म 15 मार्च 1913 को असम के नौगाँव क्षेत्र में हुआ था। विवाह के बाद वे छत्तीसगढ़ आईं और यहीं सामाजिक सरोकारों तथा जनसेवा से उनका गहरा जुड़ाव बना। वर्ष 1952 में वे लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं और छत्तीसगढ़ क्षेत्र से संसद पहुँचने वाली पहली महिला सांसद के रूप में उन्होंने इतिहास रचा। इसके बाद भी उन्होंने लगातार जनता की आवाज संसद तक पहुँचाई।

उनका राजनीतिक जीवन केवल चुनाव जीतने और संसद में बैठने तक सीमित नहीं था। वे समाज के उन लोगों की आवाज बनीं, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करना पड़ा। अस्पृश्यता उन्मूलन, महिलाओं की शिक्षा, बाल विवाह, दहेज प्रथा और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध उन्होंने निरंतर आवाज उठाई। संसद में अस्पृश्यता निवारण से जुड़े कानून के लिए उनके योगदान को विशेष रूप से याद किया जाता है।

मिनीमाता जी का व्यक्तित्व राजनीति से कहीं बड़ा था। वे गरीबों, मजदूरों, महिलाओं और वंचित वर्गों के दुख-दर्द को समझती थीं। उनके दिल्ली स्थित निवास को जरूरतमंद लोगों के लिए आश्रय जैसा बताया जाता है। छत्तीसगढ़ से दिल्ली पहुँचने वाला कोई व्यक्ति यदि सहायता चाहता, तो मिनीमाता के द्वार उसके लिए खुले रहते थे। यही कारण था कि वे केवल ‘सांसद’ नहीं रहीं—वे जनता के बीच ‘ममतामयी मिनीमाता’ बन गईं।

छत्तीसगढ़ के विकास से जुड़े अनेक विषयों में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। कृषि और सिंचाई के लिए हसदेव बाँगो परियोजना, भिलाई इस्पात संयंत्र में स्थानीय लोगों के रोजगार, मजदूर हितों तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रयासों को आज भी स्मरण किया जाता है। उनके नाम से जुड़ा मिनीमाता #बांगो_बाँध भी उनकी विकास-दृष्टि की स्मृति से जुड़ा हुआ है।

और फिर आया वह मनहूस दिन—11 अगस्त 1972।

मिनीमाता जी भोपाल से दिल्ली की यात्रा पर थीं। दिल्ली के #पालम हवाई अड्डे के निकट विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और ममतामयी जननेत्री सदा के लिए हमसे बिछुड़ गईं।

 संसद के तत्कालीन कार्यवाही अभिलेख में भी उनके निधन पर सदस्यों द्वारा गहरा शोक व्यक्त किया गया था। श्रद्धांजलि देते हुए उनके सामाजिक और राजनीतिक योगदान को याद किया गया तथा उनके निधन को देश और विशेषकर छत्तीसगढ़ के लिए बड़ी क्षति माना गया।

उनकी मृत्यु ने एक प्रश्न छोड़ दिया—क्या किसी व्यक्ति का जीवन उसके चले जाने के साथ समाप्त हो जाता है?

मिनीमाता का जीवन इसका उत्तर देता है—नहीं।

जो व्यक्ति समाज के लिए जीता है, वह अपनी मृत्यु के बाद भी अपने विचारों, संघर्षों और कार्यों में जीवित रहता है। मिनीमाता आज भी छत्तीसगढ़ की सामाजिक चेतना का हिस्सा हैं। महिलाओं के उत्थान और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा उनके नाम पर मिनीमाता सम्मान स्थापित किया गया है।

आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस विचार को याद करना है कि संसद की शक्ति तभी सार्थक है, जब वह अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बने। यह उस संघर्ष को याद करना है, जिसमें जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, अशिक्षा, दहेज और महिलाओं के शोषण के विरुद्ध एक महिला ने अपने समय की रूढ़ियों को चुनौती दी।

मिनीमाता का विमान दुर्घटना में निधन हुआ था, लेकिन उनकी विचारधारा कभी दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुई।

उनकी आवाज आज भी सामाजिक न्याय की माँग में सुनाई देती है।

उनकी ममता आज भी छत्तीसगढ़ की जनचेतना में महसूस होती है।

उनका संघर्ष आज भी आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाता है।

पुण्यतिथि पर ममतामयी मिनीमाता जी को शत्-शत् नमन।



“देह चली गई, पर जनसेवा का वह दीप आज भी जल रहा है;

मिनीमाता केवल इतिहास नहीं, छत्तीसगढ़ की जीवित स्मृति हैं।”



11 अगस्त 1972 को मिनीमाता जी की मृत्यु भोपाल से दिल्ली जाते समय पालम हवाई अड्डे के निकट विमान दुर्घटना में हुई थी। लोकसभा के तत्कालीन अभिलेख में भी 11 अगस्त की विमान दुर्घटना और उनके निधन पर श्रद्धांजलि दर्ज है।

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